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उसे वसा दिखी, वह सक्रिय हो गया, हम खाते गए और मोटे होते गए

डॉ. स्कन्द शुक्ल-

मानवों के ही नहीं जीवों के शरीर ‘भाँग-भवनों’ से भरे हुए हैं। भवन जिन्हें हम मेडिकल-भाषा में रिसेप्टर कहते हैं। रिसेप्टर जिनसे जाकर भाँग में मौजूद कई रसायन जुड़ जाते हैं और कोशिकाओं के भीतर तमाम क्रियाकलाप आरम्भ करते हैं। आज जब संसार-भर में मारिवाना को वैधानिक करने को लेकर बहस छिड़ी हुई है , तब इस पदार्थ और इसके सेवन के औचित्य-अनौचित्य से पहले शरीर में इसकी रासायनिक गतिविधियों पर चर्चा ज़रूरी हो जाती है।

एंडोकैनाबिनॉयड-रसायन और डेनियल पायोमेली

डेनियल पायोमेली ने एंडोकैनाबिनॉयड-रसायनों के क्षेत्र में बड़ा काम किया है। एंडोकैनाबिनॉयड वे रसायन हैं , जो भाँग के पौधे में मिलने वाले रसायनों से मिलते-जुलते तो हैं , लेकिन वे शरीर के भीतर पाये जाते हैं। इन रसायनों से जुड़ने वाले रिसेप्टर भी जीवों के शरीरों में मौजूद हैं। इन्हें सीबी 1 और सीबी 2 नाम के दो रिसेप्टर महत्त्वपूर्ण हैं।

दिलचस्प कहानी यह है कि पायोमेली के एक पोस्टडॉक छात्र निक डिपैट्रीजियो उन्हीं की एक रिसर्च को आगे बढ़ा कर शोधरत थे। पायोमेली ने यह पाया था कि भूखे चूहों में एंडोकैनाबिनॉयडों का स्तर बढ़ा हुआ होता है। लेकिन डिपैट्रीज़ियो यह नहीं खोज पा रहे थे कि ये बढे हुए एंडोकैनाबिनॉयड काम कैसे करते हैं। दूसरे शब्दों में , जिन रिसेप्टरों से चिपक कर ये अपने काम को अंजाम देते हैं , वे कहाँ हैं। मस्तिष्क में इन रसायनों व उनके रिसेप्टरों के स्तर में कोई बढ़ोत्तरी नहीं मिल रही थी।


वैज्ञानिक पायोमेली

महान् वैज्ञानिक इसलिए अलग होते हैं , क्योंकि उनकी सोच के मुख्य पथ से इतर चलती है। पायोमेली ने अपने पोस्टडॉक से कहा कि तुम मस्तिष्ककेन्द्री क्यों हुए जाते हो। जीव की देह मात्र उसका मस्तिष्क नहीं है। भूख लगने-न लगने का निर्णय पूरी तरह से मस्तिष्क ही ले , यह कहाँ का नियम हुआ ? तुम एंडोकैनाबिनॉयड-रसायनों और उनके रिसेप्टरों के बढ़े स्तर की खोज शरीर के अन्य अंगों में क्यों नहीं करते ?


मस्तिष्क शरीर का सर्वेसर्वा नहीं है

और फिर यही किया गया जिसमें डिपैट्रिजियो को विलक्षण सफलता मिली। भूखे चूहों की छोटी आँतों के जेज्यूनम-नामक हिस्सों में एंडोकैनाबिनॉयडों व उनके रिसेप्टरों, दोनों के स्तर बढ़े हुए पाये गये। शोध हमें इस निष्कर्ष तक ले गया कि भूख और वसा का स्वाद जेज्यूनम में एंडोकैनाबिनायड-स्तर को बढ़ाता है। चूहों में बढ़ी भूख के सिग्नल छोटी आँत से उपज रहे थे , न कि मस्तिष्क में।

आज हम जानते हैं कि अनेक अन्य रसायनों की ही तरह एंडोकैनाबिनॉयड-तन्त्र भी केवल मस्तिष्क तक सीमित नहीं। इसके सदस्य शरीर के ढेरों अंगों में पाये जा चुके हैं और तरह-तरह की बीमारियों में इनमें बदलाव व रिसेप्टरीय त्रुटियाँ भी देखने को मिली हैं।

आज हमें पता है कि मस्तिष्क शरीर का सर्वेसर्वा नहीं , अन्य अंग उसके कार्यानुपालक दास या ग़ुलाम नहीं। मस्तिष्क से रासायनिक सन्देश पाने के बाद उनकी भी अपनी एक हद तक स्वतन्त्र सत्ताएँ हैं। और यह भी ग़ौरतलब बात है कि केवल मस्तिष्क ही इन अंगों को प्रभावित नहीं करता , ये अंग भी मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। भूख और भोजन-तृप्ति का मतलब मस्तिष्क का हुक़्म बजाते आमाशय और आँतें न समझे जाएँ। भूख और भोजन-तृप्ति दरअसल मस्तिष्क और जठर-तन्त्र की जुगलबन्दी का नाम है। ( वस्तुतः ऑर्केस्ट्रा जिसमें अनेकानेक अंग अपना-अपना योगदान देते हैं। )

संसार भर में बढ़ता मोटापा और एण्डोकैनाबिनॉयड/आनंदामाइड

लोग अधिक क्यों खाते हैं ? संसार में बढ़ रहे मोटापे के साथ एंडोकैनाबिनॉयडों के बढ़े स्तर का क्या सम्बन्ध है और क्या इस पर काम करके मोटापे से लड़ा जा सकता है ? पाश्चात्य आहार-शैली के कारण एंडोकैनाबिनायड-स्तर शरीर-भर के अंगों में बढ़ता है। इस वृद्धि से और अधिक भोजन की इच्छा जन्म लेती है , जिससे एंडोकैनाबिनॉयड-स्तर और बढ़ता है। यह एक क़िस्म की वृद्धि से और वृद्धि का चक्र है , जो व्यक्ति को अधिकाधिक मोटा करता जाता है।

ज़ाहिर है , इस मामले पर शोध जारी हैं और तमाम असफलताओं के बीच उस एक सफलता का इंतज़ार है। डायट पिल अगर और जब आयी , तो संसार-भर में धूम मचा देगी।

सन् 1980 तक हम नहीं जानते थे कि एंडोकैनाबिनॉयडों का एक समूचा संसार हमारे शरीर के भीतर है। वे रसायन जो पूरे शरीर में अपने रिसेप्टरों के साथ फैले हैं : जिनकी कार्यप्रणाली को हम आज-तक समझने की कोशिश में हैं।

सन् 1964 में हम जान पाये कि भाँग में मौजूद एक रसायन डेल्टा-नौ टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल ( टीएचसी ) है , जिसके द्वारा भाँग अपने मनोसक्रिय प्रभाव पैदा करती है। अस्सी के दशक के बाद से हम सीबी 1 और सीबी 2 एंडोकैनाबिनॉयड रिसेप्टरों के बारे में जानते हैं। फिर हमने यह भी खोजा कि इन रिसेप्टरों से शरीर के भीतर कौन से एंडोकैनाबिनॉयड जुड़ते हैं। पहले को हमने संस्कृत के ‘आनन्द’ शब्द के आधार पर आनन्दामाइड का नाम दिया।

एण्डोकैनबिनॉयड का महत्व

भाँग कदाचित् प्रकृति में बाद में जन्मी , भाँग में मौजूद ये एंडोकैनाबिनॉयड शरीर में पहले पैदा हो गये। ये भाँग से भी पुराने अन्तःस्थित भाँग-रसायन हैं। ये मनुष्यों में ही नहीं , अन्य जीवों में , पेड़-पौधों में और यहाँ तक कि कवकों-फफूँदियों तक में पाये जा चुके हैं। एंडोकैनाबिनॉयड-तन्त्र सम्भवतः शरीर का सबसे व्यापक और सबसे पुराना तन्त्र है , जिसके बारे में हम बहुत कम जानते हैं।

इतना जानना ही अगर आपको बहुत लगा हो , तो और सुनिए। शरीर में कई एंडोकैनाबिनॉयड रिसेप्टर ऐसे भी हैं , जिनसे कोई एंडोकैनाबिनॉयड नहीं जुड़ता। वे ‘उचित’ परिस्थिति पाकर स्वतः सक्रिय हो जाते हैं और कोशिकाओं के भीतर बदलाव लाने लगते हैं। भोजन की इच्छा और तृप्ति , पाचनतन्त्र में रसों का स्राव और आँतों की गति — हर प्रक्रिया में इन रसायनों व इनके रिसेप्टरों का योगदान पाया गया है।

एंडोकैनाबिनॉयड के महत्त्व को यों समझिए। मान लीजिए सदियों-सदियों पहले आप और मैं किसी जंगल से गुज़र रहे हैं। वहाँ हमें कुछ भोजन दिखा और हमने उसे खाया। सम्भवतः कोई जानवर जिससे हमें वसा मिलती हो। अब शरीर के भीतर का एंडोकैनाबिनॉयड-तन्त्र सक्रिय हो जाएगा , मानो कह रहा हो कि जम कर खा लो और जमा कर लो। आगे पता नहीं भोजन मिले , न मिले ! जितना वसा का सेवन , उतना अधिक एंडोकैनाबिनॉयड-तन्त्र का सक्रिय होते जाना। यही हरक़त यह तन्त्र आज तब करता है , जब आप मैकडोनाल्ड में बैठकर एक-के-बाद-एक बर्गर खाते जाते हैं।

मगर आज कोई अकाल नहीं है। आज कोई सूखे की स्थिति नहीं है। आज आपको-मुझे भोजन रोज़ मिल रहा है। यह बात एंडोकैनाबिनॉयड-तन्त्र नहीं जानता। उसे वसा दिखी ,वह सक्रिय हो गया। हम खाते गये और मोटे होते चले गये।

एंडोकैनाबिनॉयड-तन्त्र के साथ शरीर के अन्य तन्त्र भी साझेदारी करते हैं , तब मोटापा जन्म लेता है। यही नहीं , एंडोकैनाबिनॉयड-तन्त्र की भूमिका डायबिटीज़ व अन्य ढेरों रोगों में मिली है। ज़ाहिर है , इन सब जानकारियों पर दवाएँ बनाने के लिए फ़ार्मा-उद्योग लगा हुआ है। लेकिन फिर बात वही है — जो सर्वत्र है , उसे साधना सर्वाधिक दुष्कर है।

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