मुद्दे विज्ञान-टेक्नोलॉजी

वीर्य तो महज एक उत्पाद है, पुरुष तो टेस्टोस्टेरॉन बनाता है

पुरुषत्व का वह हरकारा शुक्राणुओं के पालनों के बीच जन्म लेता है

टेस्टोस्टेरॉन के कारण ही है पुरुषत्व

नर की नरता टेस्टोस्टेरॉन (व अन्य पुरुषत्व-हॉर्मोन जिन्हें सामूहिक रूप से एण्ड्रोजन कहते हैं) के कारण है। वीर्य और शुक्राणु तो टेस्टोस्टेरॉन-लीला का एक अंग-भर हैं।

टेस्टोस्टेरॉन वृषणों में जन्म लेता है, फिर शरीर के कई अंगों पर अपना प्रभाव दिखाता है। यही प्रभाव पुरुषत्व है। दाढ़ी-मूँछ-भारी आवाज़, गठीला-लम्बा शरीर ये सब वीर्य और शुक्राणुओं से नहीं पैदा होते।

 

हम जान चुके हैं कि वृषणों में सेम्नीफेरस ट्यूबूलों में शुक्राणुओं का जन्म होता है। लम्बी सीधी-तिरछी संरचनाएँ। यहाँ शुक्राणु पैदा होते हैं और उनका कुछ विकास भी होता है। लेकिन सेम्नीफेरस ट्यूबूलों के बीच के स्थान में टेस्टोस्टेरॉन बनाने वाली कोशिकाएँ हैं।

 

लेडिग कोशिकाएँ

जिन्हें जर्मन वैज्ञानिक फ़्रैन्ज़ लेडिग ने खोजा था और उन्हीं पर इनका नाम पड़ा। वे जिनसे टेस्टोस्टेरॉन निकलता है और पुरुष को पुरुष बनाता है।

 

टेस्टोस्टेरॉन नहीं होगा तो शुक्राणु न बन सकेंगे। टेस्टोस्टेरॉन न होगा, तो आप मर्द न हो सकेंगे। लेकिन टेस्टोस्टेरॉन की महत्ता हमें केवल डेढ़ सौ सालों से पता चली है।

वीर्य महज एक उत्पाद है। उस जटिल प्रणाली का, जो दाढ़ी-मूँछ उगाती है और डोले-छाती चौड़े करती है।

 

(लेखक- स्कंद शुक्ला)

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