मुद्दे सोशल

हमने देखा था वो मंज़र

हमने देखा है ये मंज़र जब लाशों कि हाट लगी थी खून पड़ा था लाट लगी थी  सन्नाटा बस गूँज रहा था बता रहा था थोड़ा पहले यहाँ गज़ब का शोर-शराबा बीत चुका है जिस्म एक था कई हज़ारों इंसानों का दौड़ रहा था खून कि जिसमें हैवानों का रीत चुका है हमने देखा है […]

मुद्दे सोशल

ऑक्सीजन की सप्लाई करवाओ बच्चों के जीवन बचाने को रोक दो ये बुलेट ट्रेन

अर्थव्यवस्था की छाती पर मूंग दलेगी बुलेट ट्रेन। गरीबों के कमाए टैक्स से ख़ूब चलेगी बुलेट ट्रेन।। पटरी पर सरपट दौड़ेगी बहुत तेज़ ये बुलेट ट्रेन। सिर्फ़ सरकार की चोंचलेबाज़ी है ये बुलेट ट्रेन।। काहे को उस रुट पर चलाए भइया ये बुलेट ट्रेन। तमाम ट्रेन बस प्लेन हैं ही फ़िर काहे को भगाए बुलेट […]

मुद्दे सोशल

कुल्टा प्रमाणित कर दी जाती है, अधिकार मांगती औरतें

दुःख में पीटकर छाती उसने अपने अंगुलियों से लाल पंजों सा दाग़ लगाया है। ज़ुल्म निरंतर सह-सहकर नारी ने अपना ये हाल बनाया है।। कोसा किस्मत को उसने और भूखे अधिकारों को ख़ूब जगाया है। जब वो बेघर घर बार से हुई समझी उसका न अपना कोई न पराया है।। जीवन के इस कठिन दौर […]

मुद्दे सोशल स्त्री-विमर्श

मनुवादी निग़ाहों में खटकती हैं ये स्कूटी वाली लड़कियाँ

सुबह सबेरे कॉलेज को जाती हैं स्कूटी वाली लड़कियाँ। घर बाहर के काम भी निपटाती हैं स्कूटी वाली लड़कियाँ।। मम्मी को तो पूरा बाज़ार घुमाती हैं स्कूटी वाली लड़कियाँ। पापा को स्टेशन छोड़ भी आती हैं स्कूटी वाली लड़कियाँ।। तेज़ भी है पारंगत भी स्कूटी वाली लड़कियाँ। आज गांव शहर हर जगह दिख जाती हैं स्कूटी वाली […]

मुद्दे सोशल

भीम मिशन के ग़द्दार

बात सुविधाओं की होगी तो ये उसका लाभ सबसे पहले उठा लेंगे। अदना सा मुंह बनाकर बस सिसक-सिसक के आंसू बहा लेंगे।। रोएंगे रोना वक़्त का ये और संघर्ष के समय पर ख़ुद को बीमार बना लेंगे। ऐसे ही मिल रहे आजकल फ़र्ज़ी मिशनरी ग़रीबी का सर्टिफिकेट असल ग़रीबों से पहले बनवा लेंगे।। और कुछ […]

स्त्री-विमर्श

मैं भी औरत हूँ….

फटे आँचल पर मैं मुफलिसी का पैबंद लगाती हूँ हाँ, मैं दलित की बेटी हूँ इसलिए हर वक़्त सताई जाती हूँ। मैं जिऊं अगर सम्मान की खातिर तो मैं वैश्या कहलाई जाती हूँ जब देखो तब इस देश में सरेआम चीथड़ों में बेख़ौफ़ दौड़ाई जाती हूँ। हद तो तब और होती है जब रईस औरतों […]

मुद्दे सोशल

दरअसल मौत उसे किस्तों में आई 

उसने टीवी पर शहर की चकाचौंध देखी ऊंची-ऊंची इमारतें  चिकनी सडकें सामान से अटे बाज़ार मोटे-ताज़े स्वस्थ तंदुरुस्त लोग शाम को सैर करते हँसते मस्ती करते रात में वो रौशनी गोया चाँद ग़ैर-ज़रूरी हो काम के बाद शाम को 100-100 के नोट लेता मजदूर आने जाने के लिए एसी बसें एसी मेट्रो अनगिनत फ़्लैट वाली […]

मुद्दे सोशल

क्या उम्मीद करें और सहारनपुर न बनेंगे

झोपड़ी वाले जब महामहिम की कुर्सी पर बैठेंगे क्या महलों वाले झोपड़ियों पर न झपटेंगे क्या उम्मीद करें और सहारनपुर न बनेंगे और महामहिम के भाई बंधु न अछूत रहेंगे क्या उम्मीद करें अब झोपड़ियां न उदास रहेंगी किसी शोषक के शोषण का न ग्रास बनेंगी क्या उम्मीद करें झोपड़ियों में भी चिराग जलेगा कमज़ोरों […]

मुद्दे सोशल

हम स्वतंत्र और समान हैं, केवल कानून की किताबों में

बोला गया स्वतंत्रता लगा, मिल गई सबको स्वत्रंत्रता ‘न्याय’ शब्द आया भाषण में लगा जनता को न्याय मिल गया समतल धरती का एक कोना दिखा लगा समानता आ गई स्वतंत्र महसूसती हुई एक लड़की मिनी स्कर्ट पहन कर घूमने गई कनाट प्लेस में लेकिन ,गड़-सी गई शरीफ़ों की आँख में कुछ इशारे हुए कुछ फब्तियाँ […]

सोशल स्त्री-विमर्श

हर महीने के क़ुदरती दर्द को सहन करना किसी नारी के लिए इतना आसान नहीं

हर महीने के क़ुदरती दर्द को सहन करना किसी नारी के लिए इतना आसान नहीं। तंज़ कसना उसके लहू प्रवाह पे क्या औरत का ये अपमान नहीं? तुम घर के कोने में छोड़ देते हो क्या उन दिनों में उसका कोई मान नहीं रोक देते हो रसोई में घुसने से क्यों उसे भला क्या ये […]