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यूरिक एसिड , गाउट , भ्रान्तियाँ व निराकरण – डॉ.स्कन्द शुक्ल

तमाम रोगी जोड़ों के दर्द में दाल-मांस-दूध-इत्यादि का सेवन स्वतः अथवा किसी डॉक्टर के कहने पर रोक देते हैं। अधिक पूछने पर वे प्रोटीन का हवाला देते हैं। उनका कहना होता है कि हमें बताया गया है कि प्रोटीन खाओगे , तो यूरिक एसिड बढ़ जाएगा। इस बारे में मैं एक लम्बा लेख लिख चुका हूँ। लेकिन पुनः कुछ बातें सिलसिलेवार ढंग से जाननी ज़रूरी हैं।

हर व्यक्ति में यूरिक अम्ल मौजूद होता है। इसे हमारा शरीर ही बनाता है। हम जो भोजन करते हैं , उसमें डीएनए व आरएनए भी होते हैं। इन डीएनए-आरएनए का निर्माण प्यूरीन नामक रसायनों से होता है। प्यूरीन को भीतर रासायनिक क्रियाओं से तोड़कर हमारा शरीर यूरिक एसिड बनाता है। यही नहीं , हमारी अपनी कोशिकाओं के डीएनए-आरएनए को तोड़कर भी यूरिक एसिड का निर्माण शरीर करता है।

भोजन में कहाँ होते हैं ये डीएनए व आरएनए ? कोशिकाओं से । कहाँ से आयीं कोशिकाएँ ? पौधों ( सब्ज़ियों ) में कोशिकाएँ होती हैं , मांस में भी। शराब व चीज़ में भी खमीर-कोशिकाएँ होती हैं। यहाँ तक दूध में भी कई कोशिकाएँ आपको तैरती दिखेंगी , अगर आप सूक्ष्मदर्शी के नीचे उसकी बूँद को देखेंगे।

तो क्या सभी भोजनों से यूरिक अम्ल का निर्माण एक-समान होगा ? नहीं होगा। उन भोजनों से यूरिक अम्ल अधिक बनेगा , जिन भोजनों में डीएनए व आरएनए अधिक हों। ऐसे भोजन वे होंगे , जिनमें कोशिकाएँ ख़ूब हों और उन कोशिकाओं में ढेर सारा डीएनए-आरएनए हो।

अंग-मांस ( कलेजा , तिल्ली , अग्न्याशय ) में डीएनए से भरपूर कोशिकाएँ ख़ूब होती हैं। यही हाल सारे लाल मांस का है। लाल मांस स्तनपायी जानवर के मांस को कहते हैं। शराब भी खमीर-कोशिकाओं से भरी पड़ी है। ज़ाहिर है , अगर आप अंग-मांस-लाल-मांस -शराब के शौक़ीन हैं , तो आपमें यूरिक अम्ल के बढ़ने का ख़तरा ज़्यादा है।

बाक़ी मांस का क्या ? क्या उससे शरीर यूरिक एसिड नहीं बनाता ? बिलकुल बनाता है , लेकिन कम बनाता है। दालों का क्या ? उनमें भी डीएनए से भरी कोशिकाएँ हैं। तो क्या दालें खाना बन्द करें कि न करें ?

अब मेरी बात ध्यान से सुनिए। यूरिक अम्ल शरीर में न बढ़े , इसके लिए परहेज़ किन लोगों को करना चाहिए ? क्या सभी को ? नहीं। उन्हें जिन्हें गाउट नाम का गठिया-रोग है और उन्हें भी जिनके गुर्दे यूरिक अम्ल बढ़ने के कारण क्षतिग्रस्त हो रहे हैं और हो सकते हैं। गुर्दा-रोगियों की बात अभी जाने देते हैं। मेरा कार्यक्षेत्र गठिया-रोग हैं , उन्हीं पर आगे बात करते हैं।

गाउट के मरीज़ों को भोजन में परहेज़ ज़रूर करना चाहिए। लेकिन यह परहेज़ भी क्रमवार होता है। यह देखते हुए भोजन में बदलाव किये जाते हैं कि क्या-क्या छोड़ने से यूरिक एसिड को हम नियन्त्रित कर लेंगे। सबसे पहले मैं मरीज़ों से लाल मांस , अंग मांस और शराब बन्द करने को कहता हूँ। फिर देखता हूँ कि अगर उसका यूरिक अम्ल नियन्त्रित हो गया है , तो कभी-कभार सफ़ेद मांस ( चिकन-मछली ) चल जाता है। लेकिन क्या हो अगर लाल मांस , अंग मांस और शराब बन्द करने पर भी यूरिक एसिड बढ़ा रहे और गाउट नामक गठिया के दौरे पड़ते रहें ?

तब सारा मांस-सेवन बन्द करना होगा। एकदम बन्द। कोई किन्तु-परन्तु नहीं। कोई बहाना , कोई दलील नहीं। लेकिन फिर दालों का क्या करें ?

आप यह बात समझ लीजिए कि हम मांस , दालें , दूध और अण्डा डीएनए-आरएनए के लिए नहीं खाते। प्रोटीन के लिए खाते हैं। प्यूरीन और प्रोटीन कई बार एक ही आहार में उपस्थित होते हैं। ऐसे में अगर आप वह आहार प्यूरीन के कारण बन्द करेंगे , तो प्रोटीन भी बन्द हो जाएगा। लेकिन प्रोटीन के बिना शरीर का काम कैसे चलेगा ? हमारी हड्डियाँ-चमड़ी-मांस-अंग-ख़ून प्रोटीन के ही तो बने हैं !

ब्लैंकेट-परहेज़ मूर्खतापूर्ण अज्ञान है। अंग-मांस में और लाल मांस में प्रोटीन और प्यूरीन दोनों हैं। इन्हें पहले बन्द करिए। रोगी को प्रोटीन अन्य स्रोतों से मिल सकता है। शराब में प्रोटीन नहीं है , प्यूरीन है। इसे तत्काल बन्द करिए। फिर सफ़ेद मांस , अगर ज़रूरत पड़े , तो बन्द करिए। इसमें भी प्रोटीन और प्यूरीन दोनों हैं।

अब दालों पर आइए। दालों में भी प्रोटीन और प्यूरीन दोनों हैं। अगर मांस और शराब पूरी तरह बन्द करने से यूरिक अम्ल नियन्त्रित हो जाता है ( और जो कि बहुधा हो ही जाता है और गाउट के दौरे नहीं पड़ते ) , तो दालें खाते रहिए। दालों को एकदम से बन्द करने की सलाह अव्यावहारिक नादानी है। मांस बन्द और दाल भी बन्द ! अब व्यक्ति को प्रोटीन कहाँ से मिलेगा , बताइए ?

दालों का परहेज़ी नम्बर बहुत नीचे आता है , अत्यधिक देर में। पहले मांस और मदिरा बन्द होंगे। मरीज़ की जाँच-पड़ताल होगी। उसके दौरों को देखा जाएगा। यूरिक अम्ल का स्तर देखा जाएगा। तब दालों पर फ़ैसला होगा।

और दूध ? डेयरी के अन्य उत्पाद ? चाय-कॉफ़ी ? अन्य सब्ज़ियाँ ? अण्डे ?

दूध प्रोटीन का स्रोत है , प्यूरीन का नहीं। तो आप ही बताएँ कि क्यों बन्द होगा ? डेयरी-उत्पादों में भी प्रोटीन है , प्यूरीन नहीं — तो वे भी क्यों बन्द होंगे ? अण्डा भी प्रोटीन देता है , प्यूरीन नहीं — तो उसे भी क्यों बन्द किया जाए ? सब्ज़ियों में भी ( दालों-फलियों के अलावा ) अगर प्यूरीन नहीं है , तो उन्हें भी क्यों बन्द किया जाए ? चाय-कॉफ़ी बेवरेज हैं। उनमें न प्रोटीन बहुत है , न प्यूरीन। इसलिए उनके सेवन से कोई फ़र्क नहीं , चलने दीजिए। ( ध्यान रहे : चीज़ को बनाने में ख़मीर का प्रयोग किया जाता है और ख़मीर-कोशिकाएँ यूरिक अम्ल बढ़ाती हैं। तो इसका परहेज़ करना उचित रहेगा। )

अब इन दो सवालों पर ध्यान से ग़ौर करिए :

1 . अब क्या हर गठिया-रोग यूरिक अम्ल के कारण है ? नहीं है। तो उसमें यूरिक अम्ल वाला परहेज़ क्यों लागू होगा ? हर जोड़ों के मरीज़ को मांस व दाल खाने से रोकने से कुछ हासिल होगा ? जवाब है , नहीं। कोई फ़ायदा नहीं। उलटा भोजन में प्रोटीन के स्रोत और कम हो जाएँगे।

2 . क्या यूरिक अम्ल के बढ़ने से केवल गठिया-भर ही होता है ? जवाब है नहीं। यूरिक एसिड के बढ़ने से गुर्दे भी ख़राब हो सकते हैं। बल्कि ख़राब गुर्दों की वजह से यूरिक अम्ल पेशाब में निष्कासित नहीं हो पाता और शरीर में बढ़ने लगता है। यानी बढ़े यूरिक एसिड से गुर्दे भी ख़राब हो सकते हैं और ख़राब गुर्दों के कारण भी यूरिक एसिड बढ़ सकता है।

यूरिक अम्ल व इसके दुष्प्रभावों पर बात करते हुए हम अब आगे चलते हैं।

प्रश्न उठता है कि अगर यह रसायन इतना हानिकारक है , तो शरीर इसे बनाता ही क्यों है ? किसलिए शरीर में है यूरिक एसिड की मौजूदगी ? क्यों रहता है यह हमारे अन्दर ?

दरअसल यूरिक अम्ल का बनना शरीर के लिए लाभप्रद ही है , अगर इसकी मात्रा थोड़ी रहे। यह रसायन शरीर के भीतर एंटीऑक्सीडेंट की भूमिका निभाता है। लेकिन समस्या तब होती है , जब इस रसायन की मात्रा शरीर में सामान्य से अधिक होने लगती है। यूरिक एसिड की इसी बढ़ी हुई स्थिति को डॉक्टर हायपरयूरिसीमिया कहते हैं।

यूरिक अम्ल का सामान्य स्तर पुरुषों में 2.5 – 6 मिग्रा / डेसीलीटर व स्त्रियों में 3.5 – 7 मिग्रा / डेसीलीटर के बीच माना जाता है। इसके ऊपर जो कुछ भी है , वह हायपरयूरिसीमिया है।हायपरयूरिसीमिया सभी में नहीं होती , कुछ ही लोगों में होती है। जिनमें हायपरयूरिसीमिया होती है , उन सभी को यूरिक एसिड वाला गठिया गाउट नहीं होता। लेकिन ज्यों-ज्यों यूरिक अम्ल का स्तर सामान्य से अधिक होता जाता है , गाउट होने की आशंका बढ़ती जाती है। साथ ही यह बढ़ा हुआ यूरिक अम्ल गुर्दों में जमा होने के कारण उन्हें भी दुष्प्रभावित करता जाता है।

लोग कई बार जब लैब से यूरिक अम्ल की जाँच कराते हैं , तो यह भी कहते हैं कि रीडिंग भिन्न-भिन्न आती हैं। इसका कारण यह है कि यूरिक अम्ल की मात्रा हर व्यक्ति में नित्य बदला करती है। यानी मेरे भीतर यूरिक अम्ल की मात्रा सदा एक-सी नहीं रहेगी। बढ़ेगी-घटेगी , इसी तरह बदलती रहेगी। लेकिन अगर मैं सामान्य हूँ , तो यह अपनी रेंज के भीतर रहेगी। यूरिक एसिड अगर रेंज से बाहर जाने लगेगा , तो यह हायपरयूरिसीमिया कहलाने लगेगा।

यूरिक अम्ल का गठिया गाउट प्रचण्डतम दर्द पैदा करने वाला गठिया-रोग है। गाउट के समान दर्द अमूमन आपको किसी अन्य आर्थ्राइटिस में महसूस नहीं होगा। कारण कि यूरिक अम्ल जब जाकर किसी जोड़ में जमा होता है , तो वह प्रचण्ड इन्फ्लेमेशन पैदा करता है। उस जोड़ में व उसके इर्दगिर्द ढेर सारी प्रतिरक्षक कोशिकाएँ जैसे न्यूट्रोफिल जमा होने लगती हैं। नतीजन जोड़ में तेज़ दर्द उठता है , सूजन आती है और कई बार जोड़ के ऊपर की त्वचा लाल भी हो जाती है।

अब यह समझिए कि हर व्यक्ति जिसका यूरिक अम्ल बढ़ा है और जिसे जोड़ में दर्द हो रहा है , उसे गाउट नहीं कहा जा सकता। मान लीजिए किसी के घुटनों में दर्द तो है , लेकिन उस दर्द की प्रकृति व लक्षण गाउट-जैसे नहीं हैं। यूरिक एसिड ख़ून में बढ़ा निकलता है। ऐसे मरीज़ को गाउट-पीड़ित नहीं कहा जा सकता। गाउट की डायग्नोसिस के लिए गाउट के लक्षणों का होना ज़रूरी है। किसी में भी बढ़े हुए यूरिक एसिड को देखकर किसी भी प्रकार के जोड़-दर्द को गाउट नहीं कहा जाना चाहिए। चूँकि ऊपर मैंने बताया कि यूरिक अम्ल का स्तर घटता-बढ़ता रहता है , इसलिए ऐसा भी पाया है कि यूरिक अम्ल का स्तर रेंज के भीतर है , किन्तु जोड़ की समस्या गाउट-जैसी है , इसलिए उसे गाउट है।

मोटी बात यह कि लक्षण से डायग्नोसिस बनेगी , न कि केवल बढ़े हुए यूरिक अम्ल से। लक्षण के साथ बढ़ा यूरिक अम्ल — गाउट। लक्षण के साथ सामान्य यूरिक अम्ल — फिर भी गाउट की प्रबल आशंका। लक्षण गाउट जैसे नहीं , लेकिन यूरिक अम्ल बढ़ा हुआ — गाउट नहीं , कुछ और।

गाउट की जब किसी व्यक्ति में शुरुआत होती है , तो यह गठिया तेज़ दर्द के दौरे की तरह उठता है। प्रचण्ड दर्द। सूजन व लाली साथ में। अमूमन दर्द पैरों की उँगलियों में , टखनों में या घुटनों में होता है। अमूमन केवल एक जोड़ में। सबसे अधिक आशंका पैर के बड़े अँगूठे में। दर्द का यह दौरा अमूमन हफ़्ते-दस दिन में अपने-आप या दवाओं के सेवन से ठीक हो जाता है।

इस तरह के दौरे बार-बार पड़ सकते हैं। उसी जोड़ में या किसी अन्य जोड़ में। दर्द के दौरों का इस तरह पड़ना एक्यूट गाउट कहलाता है। बार-बार पड़ते एक्यूट गाउट के ये दौरे जिस जोड़ में पड़ते हैं , उसे ख़राब करने लगते हैं। दो दौरों के बीच की अवधि को इंटरक्रिटिकल अवस्था कहते हैं। यानी दो दौरों के बीच यूरिक अम्ल बढ़ा तो हुआ है , लेकिन अपने प्रभाव से किसी जोड़ में दर्द नहीं पैदा कर रहा। शुरू में मरीज़ में एक्यूट गाउट के दौरे कम पड़ते हैं , तो किन्हीं दो दौरों के बीच की इंटरक्रिटिकल अवस्था लम्बी होती है।फिर बार-बार जल्दी-जल्दी एक्यूट गाउट के दौरे पड़ने से धीरे-धीरे यह अवस्था घटने लगती है। फिर ऐसा होता है कि रोगी के जोड़ हमेशा के लिए ख़राब हो जाते हैं। एक्यूट गाउट और इंटरक्रिटिकल गाउट के बाद यह तीसरी अवस्था क्रॉनिक गाउट कहलाती है।

क्रॉनिक गाउट में रोगियों के जोड़ों व अन्य अंगों ( जैसे कान ) के इर्दगिर्द यूरिक एसिड की गाँठें मिल सकती हैं। इन गाँठों के ऊपर की त्वचा छिल जाने से कई बार ख़ून नहीं निकलता , सफ़ेद पाउडरनुमा बुरादा झड़ता है। यह यूरिक अम्ल ही है।

आप प्रश्न करेंगे कि यूरिक अम्ल का यह गठिया पैरों में ही अधिक क्यों होता है ? उत्तर है कि शरीर के जो हिस्से ठण्डे होंगे , उनमें यूरिक अम्ल के जमने की आशंका अधिक होगी। इसीलिए यूरिक अम्ल का यह जमावड़ा पैरों में अधिक दिखायी देगा , हाथों में कम। गाउट के ये दौरे ठण्डे मौसम में अधिक देखने को मिलेंगे , गर्मी में कम।

गाउट बच्चों में बहुत-बहुत रेयर है। महिलाओं में भी अत्यधिक कम पाया जाता है। इसलिए अगर किसी बच्चे का या महिला का कोई यूरिक अम्ल कराकर गाउट की डायग्नोसिस बनाता है और मुझसे मशविरा करता है , तो मैं सौ बार सोचता हूँ। पुरुष-वर्ग में ही गाउट के अधिसंख्य रोगी पाये जाते हैं। प्रौढ़ावस्था में , वृद्धावस्था में। लेकिन बीते कई सालों से बदलती दिनचर्या के कारण गाउट अब अपेक्षाकृत कम उम्र के युवाओं में भी मिलने लगा है।

आगे और बातें यूरिक अम्ल व गाउट पर


यूरिक एसिड से जूझना हमारी शारीरिक मजबूरी है , ऐसा समझ लीजिए।

यह अम्ल ढेरों जीवों में बनता है। नाइट्रोजनीय अपशिष्टों को शरीर तीन रूपों में बाहर निकालता है : अमोनिया , यूरिया या फिर यूरिक अम्ल के रूप में। अमोनिया के रूप में उत्सर्जन की प्रक्रिया में अत्यधिक पानी की खपत होती है। यूरिया को निकालने में उससे कम और यूरिक अम्ल में सबसे कम पानी चाहिए।

यही वजह है कि रेगिस्तानी जीवों में उत्सर्जन यूरिक अम्ल के रूप में होता है , जिसे वे मल में निकलते हैं। इस तरह से गन्दगी भी शरीर से बाहर कर देते हैं और इस दौरान पानी की बर्बादी भी बचा लेते हैं। ढेर सारे अन्य जीवों में यूरिक अम्ल को आगे एक दूसरे पदार्थ एलेन्टॉइन में बदल देते हैं। इसके लिए उनके भीतर एक एन्ज़ाइम यूरिकेज़ होता है।

हम-मनुष्यों में और अन्य कपि-प्रजातियों ( प्रायमेटों ) में यूरिकेज़ नहीं होता। इसलिए यूरिक अम्ल को आगे किसी अन्य पदार्थ में हम बदल नहीं सकते। हमें इस रसायन से अपने शरीर के भीतर ही जूझना पड़ता है।

गाउट पर पिछले अंक में बात की थी। गाउट के लिए लक्षण सर्वाधिक महत्त्व के हैं , न कि बढ़ा यूरिक अम्ल। मरीज़ का लिंग देखिए , उसकी उम्र देखिए , लक्षणों को समझिए , फिर यूरिक अम्ल की रिपोर्ट। यह नहीं कि बढ़ा यूरिक अम्ल देखा और किसी भी औरत या बच्चे में जोड़दर्द पाया और फट से गाउट की डायग्नोसिस बना दी। यह ग़लत है। सिलसिलेवार ढंग से रोग को रोगी के साथ समझना ही चिकित्सा विज्ञान और कला का सम्मिलित रूप है।

गाउट अगर किसी को है , तो उपचार कितने दिन चलेगा — लोग पूछते हैं। उत्तर है आजीवन। दवाएँ पाँच महीने , दस महीने , साल-भर या पाँच साल नहीं खायी जाएँगी। डॉक्टर के निर्देश के साथ उन्हें पूरी ज़िंदगी खाना होगा। जब बन्द करेंगे , तब पुनः यूरिक अम्ल बढ़ने और जोड़ व गुर्दे खराब होने का खतरा हो जाएगा। लेकिन इस बात से पहले यह निश्चित करना होता है , कि क्या रोगी को वास्तव में यूरिक अम्ल के औषधीय उपचार की आवश्यकता है ?

हर वह व्यक्ति जिसका यूरिक अम्ल बढ़ा है , एसिम्टोमैटिक हायपरयूरिसीमिया यानी लक्षणहीन बढ़े हुए यूरिक अम्ल से ग्रस्त है। पर इसके लिए सभी को दवा खाने के निर्देश नहीं। ढेरों लोग अपना यूरिक अम्ल जीवनचर्या में परिवर्त्तन करके सामान्य रेंज में ला सकते हैं। दवाएँ उन्हीं को खानी हैं जिनका यूरिक अम्ल का स्तर लक्षण न होने के बावजूद 11 मिग्रा / डेसीलीटर से अधिक है , जिन्हें गाउट है ( चाहे यूरिक अम्ल का स्तर कुछ भी क्यों न हो ) , जिनके गुर्दे प्रभावित हैं अथवा जिन्हें कैंसर की कीमोथेरेपी चल रही है।

बढ़े हुए यूरिक अम्ल के लिए , गाउट के लिए अथवा ख़राब गुर्दों के लिए दवाएँ क्या हैं — यह आम जन का क्षेत्र नहीं। लेकिन सामान्य व्यक्ति अपना यूरिक अम्ल बढ़ने से कैसे रोके , इसपर बात अवश्य की जा सकती है।

1 . पानी का सेवन : व्यक्ति जितना कम पानी पिएगा , उतना यूरिक अम्ल के बढ़ने की आशंका रहेगी। पानी अधिक पिएँगे , यूरिक अम्ल को पेशाब में निकाल सकेंगे। इसलिए अगर पानी पीने के लिए डॉक्टर से मना न किया हो , तो कम-से-कम तीन लीटर अवश्य पिएँ।

2 . मदिरा व लाल मांस / अंग मांस / सभी मांसों के सेवन से परहेज़ : इस विषय पर हम पिछले अंक में बात कर चुके हैं।

3 . खट्टे फल व विटामिन सी : विटामिन सी एस्कॉर्बिक अम्ल कहलाता है। यह एस्कॉर्बिक अम्ल यूरिक अम्ल का शत्रु है , इसका स्तर कम करता है। इसलिए अगर डॉक्टर ने मना न किया हो , तो नींबू , सन्तरा , आँवला , मौसमी का रस भोजन में सम्मिलित करें , यूरिक स्तर कम होने लगेगा।

4 . नित्य व्यायाम : मोटे लोग अपनी यूरिक एसिड की रिपोर्ट देखकर दुखी हैं। दुखी होने से कुछ नहीं होगा , ऐक्शन लेने से स्थिति सुधरेगी। मोटापे के साथ जिस तरह शुगर , कोलेस्टेरॉल व ब्लडप्रेशर जुड़े हुए हैं , उसी तरह बढ़ा यूरिक अम्ल भी। इसलिए पतले होइए। नित्य व्यायाम कीजिए , करते रहिए।

5 . जंक भोजन : जंक भोजन ( पीत्सा-बर्गर इत्यादि ) जिस तरह से प्रॉसेस्ड किया जाता है , उससे यूरिक अम्ल बढ़ता है। इसलिए मोटे अनाज का सेवन करें , मैदे से दूर रहें। कोल्ड ड्रिंक तो एकदम न पिएँ। चीनी का सेवन भी कम-से-कम करें। कॉर्न सीरप जैसे खाद्य भी कम-से-कम खाएँ।

6 .दवाएँ : कई दवाएँ भी यूरिक अम्ल बढ़ाती हैं। यदि यूरिक अम्ल की समस्या से जूझ रहे हों , तो डॉक्टर को उन्हें बदलने का प्रयास करना चाहिए।

इन सब बातों के बाद दवाओं का स्थान आता है। इतना करेंगे और ( आवश्यकता पड़ने पर ) दवाएँ खाएँगे , उपचार सफल होगा। केवल दवा से या केवल जीवन में बदलाव से हर रोगी को ठीक नहीं किया जा सकता।

अन्त में बात कैंसर-कीमोथेरेपी व बढ़े यूरिक अम्ल पर। कैंसरों की कोशिकाएँ कई बार बड़े पैमाने पर स्वतः नष्ट होती हैं या दवाओं द्वारा उन्हें नष्ट किया जाता है। इस स्थिति को ट्यूमर लायसिस सिण्ड्रोम कहते हैं। ज़ाहिर है , जब कोशिकाएँ नष्ट होंगी , तो डीएनए निकलेगा। उसके प्यूरीनों को यूरिक अम्ल तोड़ा जाएगा। नतीजन यूरिक अम्ल का स्तर बढ़ जाएगा। इसलिए कैंसर-उपचारी डॉक्टर लोगों के अपने रोगियों के यूरिक-अम्ल-स्तर पर कड़ी नज़र रखते हैं और उसे नियन्त्रित भी करते हैं।

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