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भारतीय समाज के आदर्श जनप्रतिनिधि हैं तेज बहादुर

जो समाज जैसा होता है वैसी ही राजनीति होती है। और उत्तरोत्तर दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते चलते हैं। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि समाज बहुत ढोंगी हो लेकिन राजनीति ईमानदार हो जाए। और इसका उल्टा भी संभव नहीं। राजनीतिक दल और राजनेता वही भाषा बोलते हैं जो समाज को समझ में आती है और वही काम करते हैं जिसे समाज होते देखना पसंद करता है।

समाज और राजनीति साथ-साथ एकदूसरे को इस अर्थ में प्रभावित करते चलते हैं कि समाज अपने बीच से अगर अच्छे प्रतिनिधि चुनकर भेजता है तो वे समाज हित में बेहतर कार्य करते हैं। उनके बेहतर कार्यों से समाज का विकास होता है, समाज बेहतर होता है। समाज में जागरूकता फ़ैलती है तो फिर समाज और अच्छे प्रतिनिधि चुनता है, फिर वो और अच्छे कार्य करता है। यह एक चेन रिएक्शन की तरह होता है। यह चेन रिएक्शन उलटी तरफ भी जाता है।

भारत में यह चेन रिएक्शन उलटी तरफ चलता है। हम जितने ढोंगी और पाखंडी हैं हमने अपने में से बेहतरीन ढोंगी और पाखंडी चुन कर भेजे उन्होंने समाज को और नयी पीढ़ी को और ज़्यादा ढोंगी और पाखंडी बनने में मदद की, प्रोत्साहित किया। और यह प्रक्रिया लगातार चलती जा रही है।

देश को समाज को घाघ, वाकपटु और काइयाँ राजनेता नहीं चाहिए। ऐसे नेता आम आदमी की तकलीफ और समस्या को क्यों समझेगा और क्यों उसे हल करेगा। वह तो समाज को मूढ़ और पाखंडी बनाये रखने के हर जातन करेगा, क्योंकि वह हमेशा सत्ता में रहना चाहेगा। लेकिन हम चुनाव दर चुनाव ऐसे ही प्रतिनिधि चुनते आ रहे हैं। और यह मानते हैं कि जिसे अच्छा भाषण देना नहीं आता, जो नौटंकी नहीं कर सकता, जो झूठ नहीं बोल सकता, जो दो और दो पांच करना नहीं जानता वह अच्छा जनप्रतिनिधि नहीं हो सकता।

हमने यह मान लिया है कि राजनीति एक शतरंज का खेल है, और संसद शतरंज की बिसात। यह मान लेने पर हमारी कोशिश होती है कि शतरंज की तरह के माहिर खिलाड़ी वहां पहुंचें। तो जाहिर है वे वहां पहुँच कर जन सरोकार के मुद्दे क्यों उठाएंगे। वो तो वहां चालें सोचेंगे नयी नयी। एक दूसरे की चालों की काट सोचेंगे। एक दूसरे को मात देने के बारे में ही पूरे वक़्त विचार करेंगे। वही कर भी रहे हैं।

यानी हमने यह मान लिया है कि जो आम इंसान है, जिसमे एक आम आदमी के सारे गुण हैं वह अच्छा जनप्रतिनिधि नहीं बन सकता। जबकि सच्चाई यह है कि जन प्रतिनिधि तो वही होगा जो बहुसंख्य जन का प्रतिनिधित्व करता हो। समाज का काम है अपना जनप्रतिनिधि चुनना। फिर उन जनप्रतिनिधियों का काम है अपना नेता चुनना। और संसद/विधानसभा में जन सरोकार के मुद्दों को उठाना, उनपर ईमानदारी से चर्चा करना। देश हित में नीतियों के निर्माण में समाज के प्रतिनिधि के तौर पर यह सुनिश्चित करना कि समाज को इससे कोई हानि तो नहीं हो रही।

तेजबहादुर एक आम इंसान की तरह बर्ताव करते हैं। उनमे एक आम इंसान जैसी इच्छाएं हैं भावनाएं हैं। आम इंसान की तरह भटकते हैं, चोट खाने पर आम इंसान की तरह रिएक्ट करते हैं, आम इंसान की तरह विद्रोह करते हैं। फिर एक आम इंसान की तरह प्रतिरोध के लिए देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव में खड़े हो जाते हैं। तेज बहादुर एक आदर्श जनप्रतिनिधि हैं। तेज बहादुर एक आम भारतीय ‘जन’ का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही कारण है कि 2014 में अरविन्द केजरीवाल की दावेदारी पर कोई खतरा नहीं था, लेकिन तेजबहादुर की दावेदारी को निरस्त करने के लिए पूरा जोर लगा दिया गया।

अगर भारत के लोकतंत्र को कोई बचा सकता है तो तेज बहादुर जैसे आम लोग। ऐसे आम जन अधिकाधिक संख्या में राजनीत में लगातार आते रहे तो राजनीति की दिशा सुधर सकती है वरना शातिर, घाघ, वाक्पटु, ढोंगी, प्रायोजित लोग देश को समाज को ऐसे ही गर्त में धकेलते जाएंगे। 

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