सोशल स्त्री-विमर्श

देश की सबसे बड़ी ‘क्रांतिकारी’ महिला की कहानी

फूलन देवी, एक ऐसा नाम जो क्रांति का सबसे बड़ा स्वर कहा जा सकता है। फूलन ने अपने उपर हुए हर अत्याचार का बड़ी मजबूती और निडरता से सामना किया। फूलन की मौत को 16 साल हो चुके हैं, लेकिन बागी से सांसद बनी फूलन देवी के किस्से आज भी चंबल के बीहड़ों सुने और सुनाए जाते हैं। फूलन का जंगल से संसद तक का संघर्ष बहुत बड़ा था। 25 जुलाई 2001 को फूलन देवी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
विद्रोही फूलन की जिंदगी में ऐसे बहुत से पड़ाव आए जो हर अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए बहुत ही सामान्य हैं। लेकिन फूलन देवी ने अपने उपर हुए जुल्म और अत्याचार को चुपचाप सहने से इंकार कर दिया और इन पूरे तंत्र के खिलाफ जंग छेड़ दी। कम उम्र में शादी, फिर गैंगरेप और फिर इंदिरा गांधी के कहने पर सरेंडर। मध्यमार्ग की टीम फूलन देवी के संघर्ष की कुछ घटनाएं आपतक लेकर आई है-
फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को यूपी के एक छोटे से गांव गोरहा में हुआ था। फूलन का जन्म मल्लाह जाति में हुआ था जिसके चलते ताउम्र उनको जातिगत भेदभाव और छुआछूत का शिकार होना पड़ा।
11 साल की उम्र में फूलन देवी के चाचा मायादीन ने फूलन की शादी एक बूढ़े आदमी पुट्टी लाल से करवा दी। शादी के बाद फूलन देवी के साथ दुराचार हुआ। उसके बाद मौका पाकर वह अपने घर भागकर आ गई और अपने पिता के साथ मजदूरी में हांथ बंटाने लगी।
15 साल की नादान उम्र में फूलन देवी के साथ एक बहुत भयावह हादसा हुआ। फूलन के गांव के ठाकुरों ने उनके साथ गैंगरेप किया।
सामाजिक और शारीरिक प्रताड़ना को सहते हुए फूलन इन अत्याचारों के खिलाफ लड़ती रही और इंसाफ के लिए दर-दर भटकती रही। गांव के ही डकैतों ने फूलन पर हमला भी किया और उनको उठाकर ले गए और कई बार रेप किया। इसके बाद फूलन ने इन सब अत्याचारों के खिलाफ बेखौफ लड़ने की ठानी और फूलन की जिंदगी में नया मोड़ आया। यहीं फूलन की मुलाकात विक्रम मल्लाह से हुई और दोनों ने साथ मिलकर अन्याय के खिलाफ लड़ने का फैसला। लेकिन जल्द ही विक्रम को मार दिया गया था।
फूलन देवी ने खुद पर हुए उत्पीड़न का बदला 1981 में 22 राजपूत जाति के लोगों को एक लाइन में खड़ा कराकर गोलियों से छलनी कर लिया। इस घटना के बाद पूरे चंबल में फूलन का खौफ फैल गया। सरकार ने फूलन को पकड़ने के आदेश जारी कर दिए, लेकिन यूपी और मध्य प्रदेश की पुलिस फूलन को पकड़ नहीं पाई।
तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1983 में फूलन देवी को सरेंडर करने को कहा, जिसको फूलन देवी ने मान लिया। फूलन ने सरेंडर करने से पहले सरकार के सामने कुछ शर्तें रखी, जिनमें पहली शर्त उसे या उसके सभी साथियों को मृत्युदंड नहीं देने की थी। फूलन की दूसरी शर्त ये थी कि उसके गैंग के सभी लोगों को 8 साल से अधिक की सजा न दी जाए। इन शर्तों को सरकार ने मान लिया था।
फूलन देवी 11 साल तक जेल में रहीं। 1994 में समाजवादी पार्टी की सरकार ने फूलन को जेल से रिहा किया और रिहाई के दो साल बाद ही फूलन को समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ने का ऑफर मिला। वो मिर्जापुर सीट से जीतकर सांसद बनी।
2001 फूलन देवी के लिए आखिरी साल था। जातीय जहर से भरी मानसिकता के कारण शेर सिंह राणा ने दिल्ली में फूलन देवी के घर पर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। हत्या के बाद शेर सिंह राणा ने जातीय दंभ भरते हुए कहा कि फूलन को गोली मारना 1981 में 22 राजपूतों की हत्या का बदला है।
फूलन देवी ने भेदभाद, असमानता और जातीय घृणा के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी। जेल से रिहा होने के बाद हथियार छोड़कर फूलन ने लड़ाई को लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ाया। संसद में महिलाओं और शोषितों लिए आवाज़ भी उठाती रहीं। अपनी रिहाई के बाद फूलन देवी ने बौद्ध धर्म को अपनाकर बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर के प्रबुद्ध भारत के सपने को साकार करने में अपनी भूमिका निभाई।
फूलन देवी के जीवन संघर्ष पर डायरेक्टर शेखर कपूर ‘बैंडिट क्वीन’ नाम से फिल्म बनाई थी। जिसमें उनके साथ हुए अत्याचार और अमानवीय व्यवहार को दिखाया है। महिलाओं पर अत्याचार तो पूरी दुनिया में हो रहा है लेकिन फूलन देवी ने खुद पर हुए अत्याचार के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी जिसके कारण इतिहास में उनका नाम हमेशा याद रखा जाएगा।
(टीम मध्यमार्ग)