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लोग निजता ( गोपनीयता ) को सँभालने और खोने का अर्थ ही नहीं जानते

स्कन्द शुक्ल-

सौ लोगों से पूछिए कि क्या उन्हें अपनी निजता ( गोपनीयता ) की चिन्ता रहती है। पचासी ‘हाँ’ कहेंगे। फिर इन्हीं सौ से पूछिए कि क्या वे मुफ़्त में मिल रहे बड़े बर्गर के बदले अपना थोड़ा डीएनए देंगे। सुई से ख़ून निकालकर नहीं , केवल लार से। पचासी फिर ‘हाँ’ कहेंगे।

निष्कर्ष : लोग निजता ( गोपनीयता ) को सँभालने और खोने का अर्थ ही नहीं जानते।

( ऑस्टिन हिल , 2002 )

निजता और विलासिता में चुनना कठिन काम है। और फिर हर समय यह याद नहीं रहता कि हम निजता लेकर घर से निकले हैं। रास्ते में हमें व्यापारी विलासिता लिये मिलता है ; हमारी लार टपक जाती है। वह हमसे अदला-बदली करता है। पैसे नहीं माँगता , केवल प्यार से विलासिता को आगे करके निजता माँगता है। हम बहक जाते हैं। विलासिता हमें ठग कर निजता ले जाती है।

ऐसा नहीं है कि यह कोई बड़ी मेहनतकश ठगी है। सीधा-सादा-सरल मामला है एकदम। व्यक्ति के विलासबिन्दु को पकड़ो। ढूँढ़ो कि उसका हेडोनिज़्म का केन्द्र किधर है। कोई तो होगा , बस उसी पर निशाना लगाओ। व्यक्ति तुरन्त अपनी निजता का समर्पण सहर्ष कर देगा।

एक बेशर्म मित्र से इधर निजता-विलासिता के द्वन्द्व पर बात हो रही थी। उनका कहना था कि निजता जब अधिकांश की अधिकांशतः जा रही है , तो रोना कैसा ? सभी तो लगभग सार्वजनिक हैं। नाम-पता-फ़ोटो-ईमेल-फ़ोन नम्बर-पसन्द-नापसन्द-सन्देश-आर्थिक व अन्य आँकड़े सभी कुछ तो। तो जब हम्माम में सभी नंगे हैं , तो विलाप काहे का।

वे दरसल निजता के समर्पण को केवल लोकलाज या पब्लिक शेमिंग के दृष्टिकोण से देख रहे हैं। ख़तरे जबकि इससे कहीं-कहीं बड़े और अधिक हैं। निजता ( गोपनीयता ) का सार्वजनिकीकरण बदनामी करेगा – यह सबसे छोटा नुकसान है। बड़ी हानियों पर वे सोच ही नहीं पा रहे। आर्थिक , राजनीतिक और सामाजिक। किसी भी हद तक। यहाँ तक कि किसी के प्राण ले लेने तक।

मित्र को सोचने में यह अजीब लग रहा है कि सब-कुछ जो आपके पास है , निजी है। सार्वजनिक सुविधाएँ पहले कम थीं , निजताएँ अधिक। अब ढेरों निजताएँ सार्वजनिकताओं में बदल गयी हैं और बदल रही हैं। और यह ‘सब मिलकर भोग करेंगे’ पुराना वाला ‘सहनौभुनक्तु’ नहीं है। उस आर्षोक्ति में साहचर्य के साथ सर्वकल्याण निहित था। लेकिन अब किया जा रहा डेटा का सार्वजनिकीकरण कुछ ही के स्वार्थों की पूर्ति करेगा और शेष अधिसंख्य वस्तुनिष्ठ रूप से भोगे जाते रहेंगे।

सरकारें व निजी फर्में निजताओं का इतने-ऐसे तरीक़ों से प्रयोग कर सकती हैं , जितना हम सोच भी नहीं सकते। किसी का भी वास्तविक-आभासी अस्तित्व पल-भर में विनष्ट किया जा सकता है।

उपचार क्या है ? असम्भव न सही , लेकिन मुश्किल अत्यधिक है।

पुराने ढर्रे व रास्ते एकदम बन्द न किये जाएँ। कम-से-कम बैक अप या यथासम्भव उनका प्रयोग किया जाता रहे। हर व्यक्ति अपनी मुफ़्तख़ोरी पर लगाम लगाये। कोई आपको स्कीम समझाए और आँकड़ा माँगे , तो सोचिए। कोई आपसे आपकी कोई भी निजता शेयर करने को कहे , तो विचार करिए। वह आपसे कहेगा कि मैं आपसे पैसे नहीं ले रहा , केवल आपका आँकड़ा ले रहा हूँ। आप इस बात को गाँठ बाँधकर बिठा लीजिए कि आँकड़ा नवीनतम धन का प्रकार है।

इन सब प्रयासों के बाद भी सरकारों और प्राइवेट संस्थाएँ आपसे आपकी निजता ले ही लेंगी। अन्तिम उपचार मात्र एक ही है : क्या आप बिना किसी निजता के जी सकते हैं ? अगर हाँ , तो कब तक ?

सोचना शुरू कीजिए।

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