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दुनिया को गोरापन बेचने की साज़िश चलाने वाले बेवकूफ़ों पर हँसिए

स्कन्द शुक्ल-

अगर आप साँवले / साँवली हैं , तो आप सूरज की मार झेलने वाले / वाली बहादुर हैं। आपका रंग साँवला है। गोराई बढ़ाने के झूठे वादे करने वाली क्रीमें फिर भी आपको दुखी करती हैं। आपको ऐसे में सूर्य-ज्योति को समझना चाहिए और मानव-विकास को भी।

जो गोरा है , सूरज उसे अधिक झुलसाएगा। सनबर्न उसे अधिक होंगे और यहाँ तक कि त्वचा के कैंसर भी होने की आशंका उसमें साँवले व्यक्ति से अधिक होगी। साँवली त्वचा में उस मेलेनिन की मात्रा अधिक है , जो त्वचा की कुदरती सनस्क्रीन है। यह सनस्क्रीन सूरज की पराबैंगनी किरणों से आपको गोरों की तुलना में अधिक बचाएगी। उम्र का असर आप पर देर से होगा , त्वचा कम झुलसेगी , झुर्रियाँ कम पड़ेंगी।

मानव की त्वचा के रंग का विकास अभी भी ठीक से समझा न जा सका है। हम बाल वाले पूर्वजों से विकसित हुए हैं। हमारे बाल कम हुए , तो खाल पर धूप की मार अधिक पड़ने लगी। नतीजन खाल को अपने बचाव में काला होना पड़ा।

यह सब कुछ अफ़्रीका में चल रहा था। वहाँ आज भी मानव-त्वचा का रंग गहरा है , जहाँ विषुवत वृत्त पर सूर्य धूप के तीखे बाण चलाया करता है। फिर जब मनुष्य से अफ़्रीका छोड़ा , तो सूरज के बाण भी उसे तिरछे लगने लगे। धूप की मार कम हुई , नतीजन मेलेनिन की ज़रूरत भी। इसलिए खाल का रंग हल्का पड़ने लगा और वह गोरा होने लगा।

लेकिन सूरज की किरणों से केवल नुकसान नहीं होते। उनसे लाभ भी होते हैं। जो साँवला होगा , वह अपनी त्वचा में विटामिन डी अपेक्षाकृत कम निर्मित कर सकेगा। लेकिन फिर धूप के असर से उसकी त्वचा में फोलिक अम्ल नामक विटामिन कम नष्ट होगी। सनबर्न से कैंसर तक की बात हम पहले ही कर चुके हैं।

तो पूरी दुनिया को ध्रुवीय गोराई बेचने की साज़िश चलाने वाले बेवकूफ़ों पर हँसिए। मनुष्य हर मेल के दुनिया में हैं : लम्बे-छोटे , पतले-मोटे , गोरे-काले। विविधता का विकास पर्यावरण के अनुसार मनुष्य द्वारा किया गया समझौता है। दुनिया-भर में एक मेल के बाघ नहीं हैं , न गुलाब हैं। जीवन स्थान के अनुसार अपने में बदलाव लाया करता है।

बाज़ार चाहता है कि सब लम्बे होने की इच्छा करें , पतले होने की और गोरे होने की भी। अफ़्रीका-भारत-चीन के सभी लोग स्वीडन वालों जैसे दिखने की कामना पालें। जब सब एक-जैसा बनने के लिए ज़ोर लगाएँगे , तभी तो वह फलेगा-फूलेगा।

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