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पत्रकार और योगी आदित्यनाथ वाली उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार

ईमानदारी, नैतिकता, अधिकार, कर्तव्य आदि सब सापेक्ष अवधारणाएं हैं। ये सब समय के सापेक्ष हैं परिस्थितियों के सापेक्ष हैं साथ ही साथ व्यक्ति और समाज के सापेक्ष भी है। हम यह भी कह सकते हैं कि लगभग हर अवधारणा सापेक्षिक होती है। और सच्चाई यह है कि इंसान को किसी भी अवधारणा को या कुछ भी समझने के लिए सिर्फ एक ही तरीका आता है और वह है तुलनात्मक या सापेक्षिक। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा तरीका इंसान विकसित नहीं कर पाया है कुछ भी समझने के लिए।

सोशलिस्ट फैक्टर मैगज़ीन के संपादक फ्रैंक हज़ूर का सामान सड़क पर

पिछले दिनों सोशलिस्ट फैक्टर नाम की पत्रिका निकालने वाले पत्रकार लेखक फ्रैंक हज़ूर को उत्तर प्रदेश भाजपा सरकार ने उनके सारे सामान समेत घर से निकाल कर सड़क पर फेंक दिया। फ्रैंक को यह घर सपा सरकार के कार्यकाल में आवंटित हुआ था। भारत में केंद्र और राज्य सरकारें पत्रकारों लेखकों को हमेशा से तरह तरह के तरीकों से उपकृत करती आई हैं। सपा सरकार ने कुछ अलग या नया काम नहीं किया था।

पत्रकार फ्रैंक हज़ूर का सामान किताबों समेत आवास के बाहर

लखनऊ में वैध/अवैध तरीके से सरकारी आवासों में रहते हैं सैकड़ों की संख्या में पत्रकार

लखनऊ में बड़ी संख्या में पत्रकार की हैसियत से लोगों ने सरकारी अनुदान पर ज़मीन ली है और घर बनवाए हैं। इनमे से बहुत ऐसे हैं जो इसके बावजूद सरकारी आवास में रह रहे हैं। कई तो ऐसे हैं जो अनुदान वाले माकन को किराए पर देकर सरकारी आवास में रह रहे हैं। ऐसे भी हैं जो अनुदान वाले घर और सरकारी आवंटित आवास दोनों को किराये पर देकर अपने माकन में रहते हुए दो जगह से किराया कमा रहे हैं। ऐसे भी हैं जो मात्र कहने के लिए पत्रकार हैं मगर फ़र्ज़ी हलफनामे बनवा कर सरकारी आवास और अनुदान की ज़मीन आवंटित करवा कर रह रहे हैं। ऐसे भी हैं जिन्होंने पत्रकार रहते हुए आवास आवंटित करवाया था मगर सालों से तब भी रह रहे हैं जबकि पत्रकारिता छोड़े ज़माना हो चुका है और दूर दूर तक पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया।
लखनऊ से प्रकाशित पत्रिका दृष्टान्त ने इस पर एक खोजी रपट छापी थी जिसके कुछ अंश नीचे दे रहा हूँ। 

“बीबीसी में संवाददाता रहने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके रामदत्त त्रिपाठी को तत्कालीन मुलायम सरकार ने अनुदानित दरों पर पत्रकारपुरम में प्लाट संख्या 2/91 आवंटित किया था। सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर जो प्लाट दिया गया था, उस पर इन्होंने तीन मंजिला निर्माण करवाकर व्यवसायिक कार्य के लिए किराए पर दे रखा है। गौरतलब है कि तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में अनुदानित दरों पर भूखण्ड आवंटन के समय स्पष्ट रूप से कहा था कि जो भूखण्ड उन्हें दिया जा रहा है उसे 30 वर्ष से पहले न तो बेचा जा सकता है और न ही व्यवसाय के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है इसके बावजूद श्री त्रिपाठी ने अपने भूखण्ड पर निर्माण करवाकर व्यवसायिक कार्यों के लिए दे रखा है। जानकार सूत्रों का दावा है कि उक्त भवन को आवासीय से व्यवसायिक में भी परिवर्तित नहीं कराया गया है। वर्तमान समय में श्री त्रिपाठी किस मीडिया संस्थान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं? किसी को जानकारी नहीं, इसके बावजूद श्री त्रिपाठी न सिर्फ स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से राज्य मुख्यालय की मान्यता लेकर सरकारी सुख सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं बल्कि सरकारी आवास में भी नियमविरुद्ध तरीके से अध्यासित हैं। पत्रकारों के मध्य वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले श्री त्रिपाठी ने गुलिस्तां कालोनी में (भवन संख्या 55 नम्बर) सरकारी आवास पर अपना कब्जा जमा रखा है।”

किसी समय जनसत्ता एक्सप्रेस में सम्पादक रहे पंकज वर्मा को भी सरकारी अनुदान पर गोमती नगर, विनय खण्ड में भूखण्ड संख्या 4/49 आवंटित किया गया है लेकिन वे राजधानी लखनऊ के अति विशिष्ट इलाके में मौजूद राजभवन कालोनी में भवन संख्या 1 पर अवैध रूप से काबिज हैं। इनके कब्जे को राज्य सम्पत्ति विभाग ने भी अवैध मानते हुए इनका आवास एक अन्य पत्रकार को आवंटित कर दिया था लेकिन सूबे की सत्ताधारी सरकारों से मधुर सम्बन्धों के चलते राज्य सम्पत्ति विभाग सरकारी आवास से कब्जा नहीं हटवा सका। जिस पत्रकार को पंकज वर्मा का सरकारी आवास आवंटित किया गया था उस पत्रकार ने श्री वर्मा के अवैध कब्जे को न्यायालय में भी चुनौती दी थी।

टाईम्स आफ इण्डिया के समाचार सम्पादक रहे रतनमणि लाल अब किसी मीडिया संस्थान में काम नहीं करते। इस वक्त वे एक एनजीओ के तहत निजी काम कर रहे हैं इसके बावजूद डालीबाग कालोनी के 7/13 के सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। कुबेर टाईम्स समाचार पत्र को बन्द हुए कई वर्ष हो चुके हैं इस अखबार के नाम पर एक पत्रकार ने सरकारी आवास हथिया रखा है।

एएनआई की संवाददाता कामिनी हजेला पूर्ववर्ती मुलायम सरकार के कार्यकाल में अनुदानित दरों पर विराज खण्ड, गोमती नगर में भूखण्ड संख्या 3/214 पा चुकी हैं फिर भी कामिनी हजेला ने सरकारी आवास संख्या ए-1006 से अपना मोह नहीं त्यागा। द पायनियर के संवाददाता विश्वदीप बनर्जी इन्दिरा नगर की सचिवालय कालोनी बी-26 पर वर्षों से कब्जा जमाए हुए हैं जबकि इन्हें भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 2/216 आवंटित किया गया था। दैनिक ग्रामीण सहारा के संवाददाता शरत पाण्डेय भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर भूखण्ड हासिल करने के साथ ही सरकारी आवास (विधायक निवास-2) पर कब्जा जमाए बैठे हैं।

कमोबेस इसी तरह से अनुदानित दरों पर भूखण्ड हथियाने के बावजूद सरकारी मकानों का सुख भोग रहे पत्रकारों में अतुल चंद्रा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/119’, गोलेश स्वामी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/120’ अजय जायसवाल ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/45’, कमल दुबे ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/130’ मनोज श्रीवास्तव ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/121’, आशुतोष शुक्ल ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/122’, संदीप रस्तोगी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/123’, स्वदेश कुमार ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/63 सी’, विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/187’, नदीम ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/136ए’, रूमा सिन्हा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-1/156ए’, विनोद कुमार कपूर ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 2/124’, संजय मोहन जौहरी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 1/47’, संजय भटनागर ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 1/29’, प्रज्ञान भट्टाचार्य ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या सी 3/7’, सुधीर मिश्रा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी 2/118’, सुरेश यादव ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी 1/85’, अनिल के. अंकुर ‘सी 3/10 विराट खण्ड’, ज्ञानेन्द्र शर्मा ‘3/78 पत्रकार पुरम’, कामिनी प्रधान ‘सी 3/132 विराज खण्ड’, एम.पी. सिंह ‘1/353 विनम्र खण्ड’, अश्विनी श्रीवास्तव ‘2/64 विराट खण्ड’, प्रदीप विश्वकर्मा ‘सी 1/311 विकल्प खण्ड’, मोहम्मद तारिक खान ‘सी 1/312 विकल्प खण्ड’, बालकृष्ण ‘सी 1/313 विकल्प खण्ड’, प्रदुम्न तिवारी ‘1/157 विराज खण्ड’ और दिलीप कुमार अवस्थी पत्रकार पुरम 2/77 सहित सैकड़ों की संख्या में पत्रकार सरकारी की ओर से अनुदानित दरों पर भूखण्ड पाने के बावजूद दूसरे के हक पर डाका डाल रहे हैं।

अधिकारी दे रहे हैं बचकानी दलीलें

देश भर में ऐसे पत्रकारों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है जो अवैध अनैतिक और गैर कानूनी तरीके से सरकार से किसी भी तरह का लाभ ले रहे हैं। फ्रैंक हज़ूर फिर भी उक्त सरकारी आवास का बाजार मूल्य के अनुसार किराया सरकार को बाक़ायदा हर महीने दे रहे थे। और सरकारी आवास जब आवंटित हुआ तब भी और आज भी वह पत्रकार की हैसियत से काम कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें इस तरह अपमानित करते हुए आवास से निकालने के लिए अधिकारियों की दलीलें बचकानी और पक्षपात पूर्ण नज़र आती हैं।

उत्तर प्रदेश की वर्तमान भाजपा सरकार पहले भी ऐसी बचकाना हरकतें कर चुकी है जब योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव द्वारा मुख्यमंत्री आवास खाली करने के बाद उसे गंगा जल और गौ मूत्र से पवित्र करवाया था। कुछ दिन पहले दिल्ली से पत्रकार प्रशांत कन्नौजिया को इसलिए उत्तर प्रदेश पुलिस गिरफ्तार करके ले गयी क्योंकि उन्होंने एक खबर को सोशल मीडिआ में अपने कमेंट के साथ शेयर कर दिया था। 

अगर सवाल नैतिकताऔर ईमानदारी का है तो यह नैतिकता और ईमानदारी सबके लिए बराबर होनी चाहिए। अगर सरकार को यह लगता है कि पत्रकारों को सरकारी आवास आवंटित नहीं होने चाहिए तो उन्हें बाकायदा नोटिस देकर सम्मान के साथ उनसे घर खाली करवाया जा सकता है, चाहे वो फ्रैंक हजूर हों या त्रिपाठी या वर्मा या कोई अन्य।

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