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स्वार्थ की राजनीति पर आक्रमण किए बगैर फाॅसीवादी की राजनीति पर आक्रमण नहीं हो पाएगा

हत्याओं पर रोष और विरोध के वक्त इन हत्यारों के पीछे छिपे असली दुष्टों को भी पहचान लेना जरुरी है कि आखिर 1980 के दशक से ऐसा क्या हुआ जो इस हत्यारी राजनीति को आगे बढ़ाने लगा?

लुकास चांसल और थॉमस पिकेट्टी का नया शोध पत्र में इसका जवाब मिलता है।

1939 अंग्रेजी राज का सबसे ख़राब साल था जब शीर्ष 1% लोग देश की कुल आय में 21% हिस्सा कब्जाए हुए थे। फिर अंग्रेजी उपनिवेश का पतन प्रारम्भ हुआ, यह हिस्सा घटा – 1982 में सिर्फ 6% रह गया।

1982 में ही नवउदारवादी जन विरोधी नीतियों की ओर पहले कदम उठाये गए।

1983 से विपरीत क्रम शुरू हुआ – 1% का हिस्सा बढ़कर 11% पर जा पहुँचा। इसी वर्ष इंदिरा गाँधी ने विहिप की एकात्मता यात्रा को हरी झंडी दिखाई और कर्ण सिंह की अध्यक्षता में विहिप ने जन्म भूमि आंदोलन का कार्यक्रम बनाया।

उसके बाद से दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चल रही हैं – 2014 में 1% का हिस्सा बढ़कर 22% हो गया, अंग्रेजी राज की गुलामी से भी बदतर; और फासिस्ट सत्ता में आये।

नवउदारवादी आर्थिक नीतियाँ और फासीवादी राजनीति का सञ्चालन एक ही केंद्र से होता है – पूँजीपति वर्ग। यही इसका आर्थिक आधार और प्रचार की शक्ति (कॉर्पोरेट मीडिया) मुहैय्या करता है।

जैसे-जैसे शासक पूँजीपति वर्ग द्वारा जनता का दोहन बढ़ रहा है, अधिकाँश लोगों का जीवन और कष्टकर हो रहा है, इसके खिलाफ रोष को विद्रोह में बदलने से रोकने के लिए जहरीली ताकतों को खाद पानी भी दिया जा रहा है।
दाभोलकर से गौरी लंकेश
रोहित वेमुला से अनीता
अख़लाक़ से जुनैद
नोटबंदी की 200 से अस्पतालों में हजारों गरीब बच्चों की हत्याएं।
सब एक ही श्रंखला की कडियाँ हैं, इनके पीछे एक ही वर्ग और उसके स्वार्थ की हिफाजत की राजनीति है।
इस ताकत पर आक्रमण किए बगैर फासीवादी राजनीति पर आक्रमण नहीं हो पाएगा।

 

 

(लेखक- मुकेश असीम)