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आचार्य रजनीश, श्री रजनीश भगवान रजनीश और ओशो– ये सब रूप बहुजनों के लिए घातक हैं

ओशो के बारे में एक महत्वपूर्ण बात

जो लोग एक समतामूलक और वैज्ञानिक समाज को स्थापित होते देखना चाहते हैं उन्हें आचार्य रजनीश, श्री रजनीश और भगवान रजनीश सहित प्रगतिशीलता के आधुनिक अवतार नजर आने वाले ओशो से भी बचकर रहना चाहिए। एक वेदांती पंडित के ये चारों रूप असल में दिखावे के लिए रचे गये छद्म रूप हैं। इनमें से भगवान् रजनीश नाम का रूप सबसे प्रामाणिक और वास्तविक है जो आत्मा परमात्मा, पुनर्जन्म और भूत प्रेत स्वर्ग नर्क विस्तारित कर्म के सिद्धांत, ईश्वर भक्ति और गुरुभक्ति सहित भाग्यवाद की शिक्षा देता है। ऊपर-ऊपर से यह नजर आता है कि आचार्य रजनीश- जो 1969 के पहले का रूप था और ओशो- जो कि उनके जीवन के अंतिम दो तीन वर्षों का रूप था में एक ख़ास तरह की क्रांतिकारी चमक छुपी हुई है जो कि भारत का मार्गदर्शन कर सकती है।

लेकिन गौर से देखा जाए तो इस व्यक्ति के इन चारों रूपों ने इन ने परलोकवादी अध्यात्म और मूर्खतापूर्ण अंधविश्वासों का समर्थन किया है। ‘ओशो’ एक ग्लोबल ऑडिएंस के अनुकूल भाषा बोलने वाले आदमी हैं जो. वे 1984 अमेरिका से अपमानित होने के बाद जन्म लेते हैं। इस अपमान और निराशा में उन्हें पता चलता है कि अब तक उन्होंने अध्यात्म का पाठ जिस भाषा में पढाया और जिस पूँजीवाद और लोकतंत्र की तारीफ़ की थी वो सब बेकार गया। इसीलिए ओरेगान कम्यून के नष्ट होने के बाद वो अपनी पुरानी सभी बातों को उलट देते हैं। वे असल में श्री रजनीश, भगवान रजनीश और आचार्य रजनीश की लाश पर खड़े हैं। उन्होंने खुद ही अपने इन तीन अवतारों को नकारा है। लेकिन ऐसा करते हुए उनकी अंतिम किताबों में बुद्ध और जिद्दु कृष्णमूर्ति का जो अपमान उन्होंने किया है और बुद्ध की शिक्षाओं में जिस तरह आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म का प्रक्षेपण किया है उससे साफ़ नजर आता है कि ओशो असल में बुद्ध का ब्राह्मणीकरण करने के ऐतिहासिक वेदान्तिक प्रोजेक्ट का ही हिस्सा थे। वे आदि शंकर के बाद दुसरे बड़े वेदांती पंडित हैं जिसने बुद्ध के ब्राह्मणीकरण का सुविचारित और संगठित षड्यंत्र चलाया था।

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भारत के बहुजनों को एक बात ध्यान से समझनी चाहिए

लेकिन भक्त टाइप के लोग इस बात को समझना ही नहीं चाहते। ओशो ने इसी भक्तिभाव वाली मानसिकता का लाभ उठाते हुए अपने चार रूपों की माया रची है कि एक आम आदमी तय ही नहीं कर सके कि किसी विषय में उनका अंतिम निर्णय क्या है। उनका कोई भी शिष्य या भक्त ये नहीं बता सकता कि किसी विषय पर उनकी अंतिम राय क्या है। ये वेदांती मायाजाल की सबसे पुरानी तकनीक है। एक धूर्त ज्योतिषी जिस तरह हर व्यक्ति को उसके रुझान के अनुसार सलाह देता है उसी तरह ये चार रूप और उनकी शिक्षाएं हैं। जिस व्यक्ति या जिस समुदाय से चन्दा लेने या आर्थिक लाभ लेने की आवश्यकता होती थी वे उसका समर्थन और महिमामंडन कर देते थे और उसके तुरंत बाद विरोधी पक्ष की तारीफ़ करके दूसरे पक्ष को भी लुभाते थे। ये उनके काम करने की ख़ास शैली थी जो उनकी मृत्यु तक जारी रही।

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अध्यात्म, स्व, मोक्ष, साधना, पुनर्जन्म और सिद्धि इन चारों रूपों ने खूब महिमामंडन किया था

यहाँ फेसबुक पर और अन्य जगहों पर भी देखा जा सकता है कि वेदांती भक्त टाइप के लोग ओशो के संबंध में जिस तरह की बातें शेयर करते हैं वो एकदम खालिस पुनर्जन्मवादी और भाग्यवादी समझ पर आधारित होती है। इससे साफ़ जाहिर होता है कि इस धर्मगुरु के चारों रूपों ने किस तरह के लोगों को किस दिशा में और क्यों तैयार किया है। इनमे से अधिकाँश आपको कट्टर हिन्दुत्ववादी भक्त और साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग मिलेंगे जो किसी भी अन्य भारतीय धर्मगुरु की तरह ही बहस करते हैं। उनके तर्कों को सुनेंगे तो आपको किसी मन्दिर के सामान्य पुजारी और कथाकार में और ओशो के शिष्यों की भाषा और समाज में कोई अंतर नजर नहीं आएगा। असल में कोई अंतर है भी नहीं। ये सब आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की जहरीली शिक्षा देते थे ताकि बुद्ध की शिक्षाओं से समाज को दूर ले जाया जा सके या आधुनिक समय में बुद्ध के पुनरागमन की जो संभावना बन रही है उसे नष्ट किया जा सके। इसीलिए ओशो ने अपना अंतिम समय बुद्ध की किताओं और बुद्ध के वास्तविक सन्देश में वेदान्तिक अंधविश्वास को भरने का काम किया और
उनकी एंटी तीस से अधिक किताबें जो जापानी झेन धर्म पर है उनमे साफ़ देखा जा सकता है कि वे बुद्ध के मुंह में जबरदस्ती आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बकवास ठूंस रहे हैं।

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भक्तों से हो रहा बुद्ध के दर्शन का नुकसान

ये सारी बात ऑन रिकार्ड मौजूद है। लेकिन मूढ़ भक्त ये सुनते ही नहीं। भक्त किसी के भी हों वे मूर्ख ही होते हैं। अब ये भक्ति दलित बहुजन आदिवासी समाज सहित स्त्रीयों में भी फ़ैल चुकी है. ऐसे गुरुओं की शिक्षाओं ने हमेशा ही इन तबकों से आने वाले स्त्री पुरुषों की मुक्ति की संभावना को खत्म करने का षड्यंत्र रचा है। ये गुरु लोग असल में गौतम बुद्ध और अन्य श्रमण आचार्यों की अनात्मा और अनीश्वरवाद में रची बसी वैज्ञानिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए अपना मायाजाल रचते हैं। जो लोग ओशो या रजनीश के अन्य रूपों को बुद्ध का समर्थक समझते हुए उनका प्रचार कर रहे हैं वे असल में बुद्ध और बुद्ध की शिक्षाओं में आश्वासन खोजने वाले लोगों से विश्वासघात कर रहे हैं। भारत के गरीबों बहुजनों और स्त्रीयों को एक बात ध्यान से समझ लेनी चाहिए कि आचार्य रजनीश, भगवान रजनीश और श्री रजनीश और ओशो ये सभी रूप भारत में बुद्ध और बौद्ध शिक्षा को नष्ट करने के लिए रचे गए हैं। ये बुद्ध का ब्राह्मणीकरण करने के लिए रचा गया मायाजाल है, एक जहरीला खेल है। इसे ठीक से समझकर इससे दूर रहना चाहिए। ये खेल इस देश में हर क्रांतिकारी दार्शनिक के साथ हुआ है और उसके अपने मूर्ख भक्त इस खेल में इस्तेमाल हो जाते हैं। कबीर को भी इसी तरह इस देश से खत्म किया गया है। ओशो ने कबीर को भी वेदांती पंडित की तरह पेश करके भारत के दलितों बहुजनों की मुक्ति की संभावना को कुंद किया है।

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(लेखक- संजय जोठे)

M.A.Development Studies,
(I.D.S. University of Sussex U.K.)
PhD. Scholar, Tata Institute of Social Sciences (TISS), Mumbai, India.

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