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आखिर संविधान से ये लोग इतना चिढ़ते क्यो हैं?

गिरीश मालवीय-

इस चुनाव में भाजपा का असली रंग सामने आ गया है। पिछले दिनों पंकजा मुंडे ने एक रैली में कहा – ‘अगर बीजेपी सत्ता में आयी तो संविधान बदल देगी।’ यह बात महाराष्ट्र की महिला व बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे अपनी बहन प्रीतम मुंडे के लिए बीड संसदीय क्षेत्र में प्रचार करते वक्त कही,

उससे पहले भाजपा सांसद साक्षी महाराज बोल चुके हैं कि ‘यदि भाजपा ने यह चुनाव जीत लिया, तो इसके बाद चुनाव की जरूरत ही नहीं होगी’

इन्हें सेक्युलर शब्द से विशेष चिढ़ है

आपको याद होगा कि 2017 में मोदी सरकार के मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने कहा था कि बीजेपी संविधान बदलने के लिए ही सत्ता में आई है और निकट भविष्य में ही ऐसा किया जाएगा. हेगड़े ने ब्राह्मण युवा परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए कहा था‘‘यदि कोई खुद को मुस्लिम, ईसाई, ब्राह्मण,लिंगायत या हिंदू के रूप में प्रस्तुत करता है तो मुझे इससे खुशी होती है लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कोई कहता है कि वह ‘सैकुलर’ है।’’

इन्हें सेक्युलर शब्द से विशेष चिढ़ है भारत की संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान पास किया तो आर.एस.एस. को बिल्कुल ही प्रसन्नता नहीं हुई थी, क्योंकि संघ वह देश बनाना चाहता है जिसका नागरिक कट्टर संघ-भाजपा की हिन्दू विचारधारा में हाँ में हाँ मिलाये. अन्यथा संघ के विचारक यह स्पष्ट राय रखते हैं कि अल्पसंख्यक चाहे वह मुस्लिम हो या जैन, बौद्ध या सिक्ख कोई हो उसके साथ वैसा ही बर्ताव किया जाना चाहिए जैसा जर्मनी में यहूदियों के साथ हिटलर ने किया

गोलवलकर ने 1949 के अपने एक भाषण में कहाः

“संविधान बनाते समय अपने ‘स्वत्व’ को, अपने हिंदूपन को विस्मृत कर दिया गया- उस कारण एक सूत्रता की वृत्तीर्ण रहने से देश में विच्छेद उत्पन्न करने वाला संविधान बनाया गया। हममें एकता का निर्माण करने वाली भावना कौन सी है, इसकी जानकारी न होने से ही यह संविधान एक तत्व का पोषक नहीं बन सका… एक देश, एक राष्ट्र तथा एक ही राज्य की एकात्मक शासन रचना स्वीकार करनी होगी… एक ही संसद हो, एक ही मंत्रिमण्डल हो, जो देश की शासन सुविधा के अनुकूल विभागों में व्यवस्था कर सके।” (गोलवलकर, ‘श्री गुरूजी समग्र दर्शन’, खंड-2, पृष्ठ 144)

संघ को हमेशा से ही संघात्मक विशेषताएं लिए हुए भारत का संविधान पसंद नहीं है गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘विचार नवनीत’ में उन्होंने लिखा है

“इस लक्ष्य की दिशा में सब से महत्व का और प्रभावी कदम यह होगा कि हम अपने देश के विधान से सांघिक ढाँचे (फेडरल) की सम्पूर्ण चर्चा को सदैव के लिए समाप्त कर दें, एक राज्य के, अर्थात भारत के अंतर्गत अनेक स्वायत्त अथवा अर्ध स्वायत्त राज्यों के अस्तित्व को मिटा दें तथा एक देश, एक राज्य, एक विधान मण्डल, एक कार्य पालिका घोषित करें। उसमें खंडात्मक, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, भाषाई अथवा अन्य प्रकार के गर्व के चिन्ह को भी नहीं होना चाहिए इन भावनाओं को हमारे एकत्व के सामंजस्य को विध्वंस करने का अवकाश नहीं मिलना चाहिए।” (एम. एस. गोलवलकर, विचार नवनीत, पृष्ठ -227)

गोलवलकर के सिद्धांत

अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इस सरकार की सारी नीतियाँ चाहे वह योजना आयोग को भंग करना हो, चाहे दोषपूर्ण जीएसटी को लागू करना सब एक ही तरफ इशारा करते हैं कि यह संघात्मक शासन प्रणाली के घोर विरोधी रहे हैं

सबसे बड़ी बात तो आपको यह समझना होगी कि जिस तरह से मोदी को इस चुनाव में एकमात्र ब्रांड के रूप में स्टेबलिश किया जा रहा है वह संघ की नीति का ही अनुपालन किया जा रहा है यह ‘एक नेता’ का सिद्धांत गोलवलकर का सिद्धांत है जो मूल रूप से प्रजातंत्र का विरोधी है ओर तानाशाही का समर्थक हैं

गोलवलकर कहते हैं…. “एक ध्वज के नीचे, एक नेता के मार्गदर्शन में, एक ही विचार से प्रेरित होकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हिंदुत्व की प्रखर ज्योति इस विशाल भूमि के कोने कोने में प्रज्वलित कर रहा है।” (गोलवलकर, ‘श्री गुरूजी समग्र दर्शन’, खंड-1, पृष्ठ 11)

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कुछ दिनों बाद हमारे हाथ से सबकुछ निकल चुका होगा

आप देखिए कि देश का एक बड़ा समुदाय भक्त बनकर खुश हो रहा है फेसबुक में भी आपको ऐसे लोगो की बहुतायत देखने को मिल जाएगी. इसे बहुत खूबसूरती को डिजाइन किया गया है. यह भक्ति वाला विचार भी संघ से ही निकला है. संघ में तर्क की जगह भक्ति और जनमत की जगह एक तानाशाह नेता की शिक्षा दी जाती है. आज यह बात लोग समझ जाएँ ओर समझा पाएँ तो ही ठीक रहेगा, नही तो कुछ दिनों बाद हमारे हाथ से सबकुछ निकल चुका होगा.