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विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 9 (मुक्ति का मार्ग)

बुद्ध का धम्म मौजूदा धर्म से अलग रहा है। कम से कम मोटी बात समझ में आई। बुद्ध के मुताबिक धर्म वह है जो मानव के बीच भेद न करे। चाहे जाति, क्षेत्र, सम्प्रदाय, मान्यताएं कोई भी, कुछ भी हों।

 

बुद्ध के अनुसार धर्म

बुद्ध के मुताबिक अपने तर्कों व अनुभूतियों से खुद को जानना और प्रकृति के नियमों का पालन करना धर्म है। कोई भी बुद्धिस्ट यही मानता है। न तो वह मूर्ति पूजा करता है न किसी के कहे मुताबिक चलता है। बुद्ध के मान्यता वाले जितने मन्दिर टाइप ढांचे बने हैं उनमें पूजा नही होती। स्तूप से लेकर पगोडा तक, सभी ध्यान केंद्र कहे जाते हैं जहां लोग ध्यान या साधना करते हैं।
विपश्यना केंद्र में घण्टे लगे हैं वो किसी भगवान को खुश करने के लिए नहीं बजाए जाते। जैसे स्कूल में समय के लिए घण्टी बजती थी, कुछ उसी टाइप उन घण्टों का इस्तेमाल होता है।

 

धर्म और धम्म

हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म जब कहा जाता है तो यह धर्म नहीं, सेक्ट हो जाता है। इस मायने में कि ये अपने आराध्य को श्रेष्ठ और अपनी मान्यता को सबसे बेहतर बताते हैं। इतना ही नहीं, अपने कथित धर्म को ऊंचा बताने के लिए दूसरे के धर्म को गालियां देते हैं उसे मारने काटने पर उतारू रहते हैं। बुद्ध का धम्म ऐसा बिल्कुल नही है।

अगर कोई बुद्धिस्ट ऐसा करता है कि कोई बुद्ध धर्म है तो उसने बुद्ध के दर्शन को सेक्ट यानी भारतीय संविधान के मुताबिक पंथ में बदल लिया।
धर्म सार्वभौमिक है, शाश्वत है। उसमें खुद को बड़ा और दूसरे को छोटा दिखाने की गुंजाइश नहीं है। धर्म वह नहीं है जो किसी दूसरे को नीचा दिखाए। अगर कोई दूसरे को नीचा दिखाता है तो वह सेक्ट है, पंथ है।

बुद्ध के मुताबिक प्राकृतिक नियम शाश्वत हैं। वह अलग अलग व्यक्तियों के लिए अलग अलग नहीं हैं। उन प्राकृतिक नियमों का पालन करना और अनुभतियों के मुताबिक खुद को जानना ही धर्म या धम्म है। इसमें किसी से किसी को लड़ने या अपने को ऊंचा व दूसरे को नीचा दिखाने की कोई गुंजाइश नहीं है। धर्म सार्वभौम होता है। वह विभेद और खुद को श्रेष्ठ बताने का काम नहीं कर सकता।

 

विपश्यना आलस्य और मौन

विपश्यना की क्रिया में आलस्य बहुत आता है। सुबह सबेरे जैसे ही ध्यान करने बैठें तो झपकियां आने लगती  हैं। भले ही रात भर अच्छे से सोए हों लेकिन नींद आती जरूर है। मौन रहना होता है। 9 दिन पूरा मौन। मौन से मुझे तकलीफ नहीं होती। घर पर ही अक्सर मौन ही रहता हूं। कंप्यूटर पर कुछ काम करना होता है तब भी मौन। कुछ पढ़ाई कर रहे हैं तब भी मौन। ऑफिस में भी कम ही बोलने की आदत है। इसकी वजह से मौन स्वाभाविक आदत बन गई है। विपश्यना के दौरान भी मौन रहने के नियम ने डिस्टर्ब नहीं किया।

आलस्य से ध्यान विचलित होता है। उसके लिए फार्मूला बताया गया कि एक घंटे की बैठक होती है, उसमें सांस तेज कर लें। अगर घर में ध्यान करते हैं तो खड़े होकर, टहलकर, आंख पर पानी के छींटे मारकर आलस्य दूर किया जा सकता है और इस प्रक्रिया के दौरान भी विपश्यना जारी रखा जा सकता है। हॉल में केवल एक ही ऑप्शन रहता है कि सांस तेज कर लें। हालांकि मैं और भी तमाम फॉर्मूले अपनाने लग गया था। घुटने के बल बैठ जाता था। कुछ देर तक घुटने पर बैठने से पालथी मारने के दर्द से राहत मिलती है, साथ ही इससे थोड़ी चेतना भी आती है, आलस्य दूर होता है।

 

भागने का ख्याल और पत्नी का डर

इस सबके बावजूद एक विकल्प हमेशा खुला हुआ था कि यह विपश्यना बीच में ही छोड़कर भाग जाऊं। विपश्यना केंद्र पर फोन जमा होने के पहले ही मुंबई में मित्र चंद्रभूषण सिंह से बात हो ही गई थी। उन्होंने आश्वस्त कर दिया था कि आप आएं। जब तक आप मुंबई में रहेंगे, मैं छुट्टी ले लूंगा और लगातार आपके साथ रहूंगा।

हालांकि उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई थी, लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइट से उनके विचारों से अवगत था। वैचारिक रिश्ते सामान्यतया बहुत ठोस होते हैं। शायद इसकी वजह यह है कि जिसे आप वैचारिक स्तर पर जान जाते हैं, उसके अगले कदम या उसके व्यवहार के बारे में आपको करीब करीब जानकारी हो जाती है। चंद्र भूषण सिंह से बगैर मुलाकात भी यह उम्मीद थी कि वह साथ देंगे। उनके अलावा भी कई मित्र मुंबई में हैं। यह पूरी उम्मीद थी कि वहां पर आराम से कुछ दिन काटा जा सकता है और फिर दिल्ली काम पर लौटा जा सकता है।

लेकिन विपश्यना केंद्र से न भागने के पीछे एक सबसे बड़ा डर पत्नी का था। अगर मैं बीच में छोड़कर भाग आता तो घर पर आने के बाद तमाम लंबे लेक्चर सुनने पड़ते। साथ में यह भी कि आपको मेरे अलावा कोई झेल नहीं सकता। मतलब मैं इतना गड़बड़ हूं कि पत्नी ही मुझे झेल सकती हैं, और किसी के साथ निभना मुश्किल है। इन सब परिस्थितियों के कारण भागने के बारे में खयाल नहीं आता। पत्नी का डर रोके रहा। यह विचार आता रहा कि चाहे जो हो, इस काम को करके ही चलना है।

साथ ही यह भी धारणा आती है कि अगर बीच में भागे तो लोगों को क्या बताएंगे कि क्यों भाग आए। आखिर यहां क्या उत्पीड़न हो रहा था, जिसकी वजह से चले आए। कोई कुछ कहता भी नहीं था। घंटी बाबा भी केवल नैतिक दबाव बनाते हैं। समय समय पर खाने, नाश्ते का भरपूर इंतजाम। रात भर स्वस्थ वातावरण में एकांत में सोने का सुख। किसी से कोई झगड़ा बवाल नहीं। शांति से और प्राकृतिक वातावरण में रहना ही तो है। बस, ध्यान के लिए बैठाते हैं। उसमें भी जब बैठे बैठे ज्यादा झेलाऊ मामला हो जाए तो पेशाब करने के बहाने या पानी पीने के बहाने जाया जा सकता है। न तो कोई रोकता है, न कुछ कहता है।

ध्यान करते करते जब मन करे तो टहलकर बाहर निकला जा सकता है। हालांकि मैंने इस फॉर्मूले का इस्तेमाल कभी नहीं करता था। एक घंटे बाद जब साधु साधु हो जाता और सभी लोग पेशाब करने या पानी पीने निकलते थे, तभी मैं भी निकलता। हालांकि 5-6 दिन बाद विपश्यना केंद्र और वहां के माहौल से थोड़ा सा अनुकूलन भी हो गया। कम के कम भागने का विचार मन से निकल गया।

 

मुक्ति का मार्ग

धीरे धीरे निरंतरता बनने लगती है। लगातार बैठने व ध्यान देने में निरंतरता बनती है। अंतर्मन शरीर को जानने की कवायद करता है। कंसंट्रेशन बनने के बाद बाहरी मन भी अनुभूति करने लगता है। गहराइयों तक जाने के लिए अंतर्मन का शरीर पर ध्यान बने रहना जरूरी है। सारे शरीर की स्थूल, सूक्ष्म, दुखद और सुखद, जो भी संवेदना हो, उसे महसूस करना जरूरी है। अनित्य बोध जगाने पर संवेदनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं होती है। यह सच्चाई अनुभव पर उतारना होता है। स्ववेदन ही दुखों से मुक्ति दे सकता है, इसकी फीलिंग सही में आने लगी।

दूसरे का अनुभव प्रोत्साहित तो कर सकता है लेकिन दुखों से मुक्ति नहीं दे सकता। चित्त को विकारों से मुक्त कर देने का मार्ग यह है कि खुद के संस्कारों को खत्म करना। जो भी संसार में बन रहा है नष्ट होता है। अनित्य होता है। संस्कार बनते हैं, वह नष्ट होता है। उसी को देखना होता है कि यह नष्ट होता है। संवेदना के प्रति भोक्ता भाव रखने में दुख ही दुख है। अगर इसे अनित्य मानकर दुखों, विकारों से बाहर निकल लिया जाए तो यही विमुक्ति का मार्ग है।

जब व्यक्ति इस अवस्था पर पहुंचता है कि उसे सभी स्थूल भंग दिखाई देने लगे, हर तरंग को महसूस करने लगे तो वह राग द्वेश से मुक्त होने लगता है। जहां जहां जब जब मन का स्पर्श होता है, वहां सारी जगहों पर उदय-व्यय की अनुभूति होती है। शरीर व चित्त के जुड़ने पर यह वेदना होती है। ऐसी स्थिति आने पर शरीर में आने वाला भारीपन, तनाव खिंचाव दूर होने लगता है। यह विकारों का भारीपन होता है, जो निकलने के बाद शरीर हल्की हो जाती है। बड़ा आनंद आता है। यह आनंद भी इंद्रियों की अनुभूति है। इसके परे की अवस्था मुक्ति है।

 

सभी सोते हैं, विपश्यना योगी जागता है

अनुभूति हर जगह होती है। किसी भी समय इसका अनुभव करते रहना होता है। खाना खा रहे हैं तो संवेदनाएं महसूस की जा सकती है। खाने का कौर उठाते समय उंगलियों में संवेदना, मुंह में खाना खाते समय संवेदना, जीभ पर होने वाली संवेदना, दांतों से चबाने की संवेदना, मसूड़ों पर उसे छू जाने की संवेदना, निगलते समय गले की संवेदना। इन संवेदनाओं को हर पर अनुभव करना है। अनित्य बोध से अनुभव करना है कि यह आती हैं और चली जाती हैं। अगर रात को सोने जाते हैं तो जहां जो संवेदना महसूस हो उसे अनित्य है, अनित्य है उसे सोचते हुए सो जाएं। फिर सोकर उठेंगे तब भी संवेदना महसूस होगी। अगर नींद नहीं आती तब भी कल्याण है। गोयनका जी इसी को कहते हैं कि सभी सोते हैं, विपश्यना योगी जागता है।

वह बताते हैं कि यह भी कल्याण की स्थिति है, लेकिन चिंता शुरू कर दें और नशा चढ़ जाए कि हम विपश्यी हैं तो रात भर जागना है, यह गलत है। नींद आए तो सो जाएं। नींद नहीं आ रही है तब भी चिंता न करें, यह सोचकर कि अनित्य है। ऐसी स्थिति में सुबह उठने पर फ्रेश महसूस करेंगे। लेकिन अगर रात भर घड़ी देखते रह जाएं कि नींद नहीं आ रही है तो मन को आराम नहीं मिलेगा। ऐसे में दूसरे दिन व्यक्ति थका हुआ उठता है। यह व्याकुलता की वजह से होता है। मन को आराम नहीं मिलता।

अगर कोई व्यक्ति जबरदस्ती जागकर विपश्यना करता है, वह भी व्याकुलता है और इससे मन अशांत होगा और दूसरा दिन खराब हो जाएगा। जरूरी यह है कि हमेशा यह अनुभूति बनी रहे कि नींद आना भी अनित्य है, नींद न आना भी अनित्य है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि निरंतर चलने वाला है, इसलिए इसे लेकर विकार न पैदा किया जाए तो मन व्याकुल नहीं होगा। इससे शरीर में स्फूर्ति बनी रहेगी, थकान और रोगों से मुक्ति मिलेगी।

 

दुखों से मुक्ति की राह पर चलने से ही दुखों से मुक्ति मिल सकती है

किसी व्यक्ति में अगर कुछ सद्गुण होता है तो लोगों को उसके प्रति श्रद्धा होती है। अगर किसी के प्रति श्रद्धा होती है तो उसके सद्गुणों को अपनाने की जरूरत है। उसके सद्गुण को अपने जीवन में उतारने की जरूरत होती है। भक्ति निष्काम होने पर व्यक्ति अपने श्रद्धेय के गुण अपनाता है। लेकिन अगर यह भक्ति सकाम हो जाए और वह मनौती मानने लगे कि हमारा काम हो जाएगा तो 100 रुपये का लड्डू चढ़ाएंगे, यह श्रद्धा नहीं है। यह तो अविश्वास है। व्यक्ति यह कहने की कवायद करता है कि काम होने पर ही लड्डू चढ़ाएंगे।

बुद्ध राजा के लड़के थे। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति छोड़ दी और दुखों से मुक्ति की तलाश करने निकले। अगर हम यह उम्मीद करें कि बुद्ध की मूर्ति पर मिठाई चढ़ाकर, उन्हें कुछ सौ रुपये का चढ़ावा देकर उनसे अपना काम करा लेंगे तो यह अजीब कंसेप्ट है। इससे कोई लाभ नहीं होने वाला है। अगर बुद्ध के प्रति भी भक्ति हो तो उनके मार्गों पर चलें, तभी लाभ होगा। कोई ऐसा तरीका नहीं है कि कुछ पैसे या मिठाई चढ़ाकर उनको अपने पक्ष में खरीदा जा सके। यह अवधारणा या कल्पना करना ही गलत है। दुखों से मुक्ति की राह पर चलने से ही दुखों से मुक्ति मिल सकती है।

 

अगले सप्ताह पढ़ें दसवां भाग….

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 1

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 2

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 3

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 4

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 5

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 6

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 7

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 8

 

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