मुद्दे सोशल

दलित राजनीति में शून्य काल

अभी 2017 है और आज से 10 बाद 2027 होगी और फिर 2037 भी, क्योंकि वक्त कभी नहीं रुकने वाला वो अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता है, लेकिन मुझे इस बढ़ते हुए वक्त से कुछ लेना देना जरूर है। वक्त के साथ सामाजिक और राजनितिक बदलाव तो आते ही हैं साथ-ही-साथ लोग बूढ़े भी होते हैं जो कि सर्वविदित है। लेकिन इससे भी बेहतर ये समझना जरुरी है कि किस समुदाय की उस प्रान्त में राजनितिक या सामाजिक स्तिथि क्या होगी या समय के बदलाव से उस पर क्या फरक पड़ेगा। मैं यंहा केवल दलित राजनीति की बात करूँगा तथा वक्त के साथ जरुरत की उम्मीद करते हुए अपने कुछ चंद शब्द रखुंगा।

अगर आप पिछले तीन दशकों की और ध्यान से देखते हैं तो आपको लगेगा कि दलित राजीनीति आज तक मजबूत है। भले ही दलित उस सबसे ऊँचे प्रधान मंत्री पद पर नहीं पहुँच पाया, इन तीन दशकों में बहुत महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव आए, शादियां, पुराने रूढ़िवादी बंधन टूटे और दलितों के विकास के पहियों पर दौड़ लगाने लगा। दलित अपने अधिकारों को समझने लगे, उच्च पदों पर पहुँचने लगे, सचिव भी बने हैं, ज्यादा से ज्यादा दलित शिक्षा की तरफ दौड़ पड़े अभियंता, डॉक्टर्स भी भीड़ में बनने लगे। सबसे महत्वपूर्ण ये रहा कि दलितों ने कई मंत्री पदों की जिम्मेदारियाँ संभाली चाहे वो केंद्र में हो या राज्य में। कुछ महत्वपूर्ण दलित नेता जिन्होंने मंत्री पद संभाले हैं उनमें से कुमारी मायावती जी, मल्लिकार्जुन खड़गे, सुशील कुमार शिंदे, रामविलास पासवान इत्यादि है। मीरा कुमार जी भी लोकसभा अध्यक्ष रह चुकी हैं।

अब बात करते है कोर दलितों की राजनीति की। जिसने दलितों के लिए स्वर्णिम युग ला दिया। भारत के सबसे बड़े राज्य यूपी में दलितों की राजनीति ने भारत की पूरी राजनीती को प्रभावित किया है। इस बड़े राज्य के बिना कोई प्रधानमंत्री बनने की सोच भी नहीं सकता है कहा भी जाता है कि प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिए यूपी से ही हाईवे जाता है। इस बड़े राज्य पर अछूतों ने अपना चार बार सत्ता का परचम लहराया है। अपनी खुद के नेतृत्व वाली सरकार बनाई है।

बहुजन समाज पार्टी भारत में एकमात्र राजनितिक राष्ट्रीय पार्टी है जो दलितों को नेतृत्व देती है, इसके फाउंडर कांशीराम थे जिन्होंने खून-पसीना एक करके इस पार्टी को खड़ा किया और यूपी को चार बार शसक्त प्रशाशन और कानून वाली सरकार दी है। कुमारी मायावती जी इस पार्टी की सुप्रीमो है जिन्होंने कांशीराम साहेब के बाद पार्टी की कमान संभाली है। कुमारी मायावती जी ने 1995 में प्रथम भारतीय अछूत महिला के रूप में यूपी राज्य की मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली। यूपी की राजनीति में मायावती जी एक मजबूत स्तम्भ है। मायावती जी के द्वारा यूपी में मुख्यमंत्री पद का कार्य काल निम्नवत रहा। 3 जून 1995–18 अक्टूवर 1995, 21 मार्च 1997–20 सितम्बर 1997,  3 मई 2002–26 अगस्त , 2003, 13 मई 2007–6 मार्च 2012।  मायावती जी ने बहुजन तथा सर्वसमाज के लिए बहुत सारे सराहनीय काम किए है। उनका योगदान अतुलनीय है इसमें कोई दो राय नहीं । इन चार कार्यकालों के दौरान दलित, पिछड़ों का उत्थान हुआ है, उनके महापुरुषों के नाम पर पार्क तथा स्मृति स्थल बनाए गए हैं जोकि बहुजनों की एक बहुत बड़ी जीत दर्शाता है। शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ज्यादा विकास हुआ है।

लेकिन आपको ये पता होना चाहिए कि इस सुखद और सफल राजनीतीक कालांतर को लाने के लिए कितने लोगों ने त्याग किया है। ये इतना आसान नहीं है खासकर भारत जैसे विषमताओं, विश्व की सबसे घिनौनी व्यवस्था जातिवाद से भरे देश में।

उस 1965 से लेकर 1990 के दौर में कुछ दलित नेताओं को उनके छात्र जीवन में प्लेटफॉर्म मिल चुके थे। हाँ, ये सत्य है कि उस दौर में आज जो अछूत, राजनीति कर रहे हैं उन्हें बना हुआ प्लेटफॉर्म मिला था। चाहे वो रामविलास पासवान हो, खड़गे जी हो या फिर मायावती जी। रामविलास पासवान उस वक्त छात्र राजनीति में सक्रिय थे और उसी दौर में आपातकाल के खिलाफ जय प्रकाश आंदोलन भी चल रहा था जिसका सीधा फायदा कहें या राजनीति में आने का मौका कहें, उस वक्त टैलेंटेड युवाओं की जरुरत थी और उन्हें प्लेटफॉर्म दिए भी गए, इस तरह बने रामविलास पासवान।

खड़गे जी भी कर्नाटक में छात्र राजनीति में रहे है और जल्द ही कांग्रेस ज्वाइन कर एक प्लेटफॉर्म पा लिया और फिर अपनी मेहनत के दम पर एक झुझारू नेता बन गए।

इसी तरह कुमारी मायावती जी में साथ भी हुआ, उन्हें भी पहले से बना बनाया प्लेटफॉर्म मिला था, अगर मान्यवर कांशीराम न होते तो शायद ही मायावती जी इतनी बड़ी नेता बन पाती क्योंकि एक मौका ही उनको इतना बड़ा नेता बनाया है अन्यथा वो तो अधिकारी तक ही सोचती थी।

लेकिन अभी 2001 से लेकर कोई भी बड़ा दलित नेता नए युवाओं को जिनके पास अटूट टैलेंट है, को प्लेटफॉर्म नहीं दे पा रहे यानी कि कोई सामाजिक आंदोलन नहीं हो रहे हैं, ये तो में नहीं जानता की वो ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं या फिर इतने समझदार नहीं है जितने कांशीराम साहेब थे, हो सकता है लालच आ गया हो अपने ही परिवार तक दलित राजनीति को समेटने का और उचित टैलेंट का गला घोंट कर कुछ भोंदू जैसे अपने ही मित्र और रिश्तेदारों को मौका देने की सोच रहे हो।

आज दलितों की राजनीति में भयानक वैक्यूम बन गया है। मैं उन दलित चेहरों की तलाश कर रहा हुं जो आज से 15 साल बाद प्रधान मंत्री के दावेदार बन सकते हैं लेकिन मुझे अभी तक कोई ऐसा चेहरा नज़र नहीं आया है। इसके लिए हम दुसरे समुदायों को दोष नहीं दे सकते क्योंकि आज बचाव की राजनीति नहीं बल्कि वर्चस्व की राजनितिक लड़ाईयाँ लड़ी जा रही है, तो फिर किसको दोष दें क्योंकि हर कोई कांशीराम नहीं बन सकता है राजनीति करने के तरीके बदल गए हैं। कौन छोड़ेगा आज अपनी सुख देने वाली अधिकारी जैसी सरकारी नौकरी को शायद आज के दौर में कोई नहीं खासकर भारत में दलित समुदाय से तो कोई नहीं।

आज दलितों में क्लर्कों की बड़ी भीड़ जमा हो गई है और ज्यादातर आप में से कुछ उन्हें देखकर खुश भी होते हैं।

दलितों में राजनैतिक प्लेटफॉर्म की भयंकर कमी है आखिर टैलेंटेड युवा जो समाज का कल्याण करना चाहते हैं वो कहाँ जाएँ। अभी इन दो सालो में जबसे बीजेपी सरकार आई है दलितों पर अत्याचार बढ़े हैं। रोहित वेमुला वाले मुद्दे पर गौर किया जाए तो सामने देखने को ये आता है कि जब सत्ता में बैठे मनुवादी उन्हें परेशान कर रहे थे तब किसी दलित राजनेता ने उनका तथा उनके साथियों का साथ नहीं दिया, क्या पता अगर हमारे राजनेता उन्हें राजनैतिक और आर्थिक रूप से सहायता करते तो उन्हें मनुवादियों के हाथों अपनी जान न गंवानी पड़ती और मैं उनके क्रांतिकारी विचारों से वाकिफ हुँ कि अगर वो हमारे बीच जिन्दा रहते तो जरूर एक बड़े नेता बनते जो हमारा प्रतिनिधित्व करते,शायद इस लड़ाई में वो खुद को अकेला महसूस कर रहे थे। गुजरात में दलितों के साथ जो हुआ था उसको कौन भुला सकता है ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि गुजरात में  दलित राजनीति ना के बराबर है, वंहा से कम-से-कम एक दो युवओं को नेता बनना चाहिए जिससे कि भविष्य में ऐसे अत्याचार को रोका जा सके। हाल फिलाल के सहारनपुर हिंसा को ही ले लो, जिसकी वजह से 21 मई 2017 को एक विशाल भीड़ इक्कठ्ठा होती है इसके कई कारण हैं लेकिन एक कारण ये भी रहा है कि दलित समाज नए दमदार नेतृत्व करने वाला युवा नेता की तलाश कर रहा है, इस भीड़ को देखकर हमारे दिग्गज नेता भी हैरान हो गए और अपने वर्चस्व को बचाने की ताक-झांक में लग गए बजाय यह सोचने के कि इस वैक्यूम को कैसे भरा जाए।

आप सभी को इस वैक्यूम जो दलित राजनीति में बन रहा है को ध्यान रखते हुए अपने लिए खुद प्लेटफॉर्म बनाइए। ये मायने नहीं रखता है की आप खुद को खड़ा करने के लिए किसका सहारा ले रहे हो, अगर आपकी विचारधारा स्पष्ट है तो आप कहीं भी रह कर अपने समाज के वर्चस्व तथा लोगों के लिए काम कर सकते हो। अगर आप इस वैक्यूम को गंभीरता से समझेंगे तभी आप आज से 15 साल बाद वाली राजनीति को समझपाएंगे क्योंकि आज जो नेता हैं वो तो बूढ़े हो चुके होंगे।

जगह खाली मत छोड़िए क्योंकि हमारे पास हमारा भरोसेमंद वोट है इसे ध्यान में रखिए वो आपको कभी धोखा नहीं देंगे।

हो सकता है मैं गलत हुँ लेकिन इस वैक्यूम का क्या करोगे?

 

(Vishwa Pratap Singh, Social activist and Ambedkarite, M.Tech, IIEST)