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हीमोग्लोबिन का स्तर उठाने के लिए जरूरी है इरिथ्रोपोएटिन

वृक्कों से निकल कर अस्थिमज्जा में जाकर लाल रक्त-कोशिकाओं के निर्माण में योगदान देने वाला इरिथ्रोपोएटिन एक हॉर्मोन है। ख़ून में ऑक्सीजन की कमी, जिसे हाइपॉक्सिया कहा जाता है, उसे पढ़कर वृक्कों में मौजूद फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएँ इसे बनाती और छोड़ती हैं।

क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़

वह बीमारी, जिसमें दीर्घकालीन समय से गुर्दे ख़राब चल रहे होते हैं, क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ कहलाती है। क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ के एक नहीं, अनेक कारण हो सकते हैं। बहुधा इससे पीड़ित रोगियों में इरिथ्रोपोएटिन-निर्माण की क्षमता प्रभावित होने लगती है, जिसके कारण रोगियों को अनीमिया हो जाता है।

थकान, साँस फूलना, बदनदर्द, कमज़ोरी, चक्कर आना- वृक्कों के किसी भी लम्बे रोग के कारण पैदा होने वाले इन लक्षणों के साथ कई बार हीमोग्लोबिन कम मिलता है।

हीमोग्लोबिन का स्तर उठाने के लिए जरूरी है इरिथ्रोपोएटिन

और यह कमी लोहा-फ़ॉलिक अम्ल-बी 12- इत्यादि ले लेने-भर से नहीं ठीक हो जाती। हीमोग्लोबिन का स्तर उठाने के लिए बाहर से इरिथ्रोपोएटिन के इंजेक्शन समय-समय पर चिकित्सक की राय के अनुसार लेने पड़ते हैं। 

इरिथ्रोपोएटिन जो हॉर्मोन था, अब दवा की भूमिका निभाता है। बीमार गुर्दों में वह बन नहीं पा रहा, सो उसकी बाहर से पूर्ति की जाती है। उसे ख़ास तकनीकी द्वारा प्रयोगशाला में बनाया जाता है और इंजेक्शन के रूप में लेने के निर्देश नेफ्रोलॉजिस्ट अपने रोगियों को देते हैं।

लेकिन इरिथ्रोपोएटिन लेने की भी अपनी सावधानियाँ हैं। उसे भी लगाते समय ख़ास बातों का ध्यान रखना पड़ता है।

 

(लेखक- स्कंद शुक्ला)

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