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रोटी मांगोगे जेल मिलेगी, शिक्षा मांगोगे लाठी मिलेगी, ऑक्सीजन मांगोगे गोली मिलेगी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को शर्मसार कर देने वाली ये तीन तस्वीरें उसी दिन की हैं जब पूरा देश, दियों की लौ, झालरों की चमक, पटाखों के शोर, पूजा का ड्रामा, बधाई संदेश, और गिफ्ट्स के आदान प्रदान मे डूबा था।

 

मुख्यमंत्री के हाथों जले एक एक दीपक की लागत 10823 ₹ आयी

लक्ष्मी आगमन की कामना मे कुछ घंटों मे अरबों रुपये जलकर राख हो गये लेकिन किसी को झारखंड की इस गरीब माँ कोयली देवी में लक्ष्मी नहीं दिखी। जिसकी ग्यारह साल की बेटी ने भूख से तड़प तड़प कर माँ की गोद मे ही दम तोड़ दिया। 
और जिस वक़्त वो बेटी इस माँ की गोद में भूख से तड़प रही थी उसी वक़्त लोकतांत्रिक तरीके से चुना हुआ एक मुख्यमंत्री दीपोत्सव के नाम पर सरकारी खजाने के 184 करोड़ रुपए लुटा कर 1 लाख 70 हजार दियो की रौशनी की चमक के पीछे अपना काला चेहरा छिपा रहा था। इस मुख्यमंत्री के हाथों जले एक एक दीपक की लागत 10823 ₹ आयी। अगर हम 20 रुपए एक दीपक की कीमत भी लगाएं तो भी 34 लाख रुपए होते लेकिन इसने 184 करोड़ रुपए लुटा दिए।

 

निजीकरण की ज़मीन तैयार करने के लिए हजारों माँओं की गोद सूनी कर दी गयी

और इसी मुख्यमंत्री के राज्य में जिसने कभी किसी माँ बाप का दर्द महसूस नहीँ किया, इसी पर्व से कुछ दिन पहले पूंजीवादी आकाओं के इशारे पर निजीकरण की ज़मीन तैयार करने के लिए हजारों माँओं की गोद सूनी कर दी गयी। घर उजाड़ दिये गए , घरों के आँगन मे मौत की चीखे गूंजने लगीं।
कोई इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है, कि जब राज्य में एक तरफ मौत का तांडव चल रहा हो सैकड़ों की संख्या में मासूम बच्चे मारे गए हों ऐसी में राज्य का मुखिया खुशी मना सके।

 

हंगर इंडेक्स में हम 109 देशों की सूची में 55 से बढ़कर 100 वें स्थान पर पहुँच गए

और उसी दिन पैसे देकर इज्जत खरीदने वाले एक मौत के व्यापारी ने, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के बाहर दिवाली बधाई संदेश के नाम पर सिर्फ अपनी तस्वीर लगाने के लिए 15 करोड़ रुपए खर्च कर दिये।
वो भी तब, जबकि 15 दिन पहले वर्ल्ड हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया मे सबसे ज्यादा लगभग 20 करोड़ भूखे लोग हमारे देश मे रहते हैं। हंगर इंडेक्स में हम 109 देशों की सूची में 55 से बढ़कर 100 वें स्थान पर पहुँच गए।

 

संवेदनहीन लोग तो लाशें देखकर भी शायद खुश होते होंगे

इस देश में हर साल हजारो मासूम भूख से बिलखते हुऐ दम तोड़ देते है। करोड़ों लोग हर रोज़ भूख से तड़प तड़पकर मरने को मजबूर हैं। हम तो उस देश मे रहते हैं जहाँ कहा जाता है कि – जब हमारे आसपास कोई भूखा हो तो हमारा खाना भी अपराध है। 
लेकिन एक तरफ़ जहाँ एक सूबे का मुखिया जश्न मना रहा था वहीं दूसरी तरफ देश का मुखिया जो खुद को व्यापारी कहता है वह 15 करोड़ रुपए खर्च करके इज्जत खरीद रहा था।
तानाशाही और क्रूरता का ऐसा खौफनाक चेहरा कि हिटलर भी शर्मिंदा हो जाये।

लेकिन इस देश मे न तो इनको शर्म आती है और ना ही  इनको भगवान मानकर पूजने वालों को कभी शर्म आयी।
ये संवेदनहीन लोग तो लाशें देखकर भी शायद खुश होते होंगे। वो लाशें चाहे भूख से तड़प कर मरे लोगों की हों चाहे बाढ़, भूकम्प, तूफान में मरे लोगों की।  इनको लाशों में सिर्फ राजनीति और सत्ता की चाभी दिखती है। या सिर्फ मदद का ढोंग कर पैसा कमाने का एक मौका।

रोटी मांगोगे जेल मिलेगी, शिक्षा मांगोगे लाठी मिलेगी, ऑक्सीजन मांगोगे गोली मिलेगी

ऐसा भी नहीं कि ये कुछ काम नहीं कर रहे। ये तो आये थे उसी दिन से काम में जुटे हैं। उस काम में जिस काम के मकसद से ये सत्ता में आये थे। कुछ काम हो गया है कुछ बाकी है। देश की फिजाओं में तो जहर घोल दिया। लेकिन इनको अभी, बिना गरीबी दूर किये देश को अमेरिका बनाना है। सैकड़ो फुट ऊंची मूर्तियाँ लगानी हैं। बुलेट ट्रेन चलानी है। डिजिटल देश बनाना है। करेंसी बन्द करनी है। स्कूल, अस्पताल, रेल का निजिकरण करना है। गाय को बचाना है। दलित, मुसलिम, आदिवासियों को मारना है।

हाँ लेकिन, गरीब अमीर के बीच की खाई नहीं भरनी। गरीब को रोटी नहीँ देनी। बीमार को ईलाज नहीं देना। बच्चो को ऑक्सीजन नहीँ देनी।
इन सब पर तो बात करना भी देशद्रोह है। आप रोटी मांगोगे जेल मिलेगी। शिक्षा मांगोगे लाठी मिलेगी। ऑक्सीजन मांगोगे गोली मिलेगी।

अभी तो आधार कार्ड के बिना राशन नहीं मिला। थोड़ा और वक़्त होने दीजिए, राशन के लिए आधार कार्ड ही नहीं। किसान, मजदूरों को क्रेडिट कार्ड तक ले जाना अनिवार्य कर दिया जा सकता है।

ये फासीवाद का दौर है।

 

(लेखक-गिरराज वेद)

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