मुद्दे सोशल स्त्री-विमर्श

ज्योतिबा फुले के आधुनिक विचारों तक पहुँचना तो दूर हम सोचने में भी हिचकते हैं

शैली किरण-

परिवर्तन ‌को अगर आप प्रेम की नजर से नहीं देख रहे हैं ,तो यकीन जानिए आप संसार की सबसे बड़ी क्रान्तिकारी शक्ति को नहीं देख रहे हैं । हृदय में ‌प्रेम धारण किए बिना समाजिक कल्याण की बातें करने वाले अंततः खोखले साबित होते हैं । प्रेम ही एक साधारण मनुष्य को वो ऊर्जा देता है कि दशरथ मांझी पहाड़ काटकर उसमे से रास्ता बना देते हैं ‌।

इतनी प्रेम कविताएं , इतनी प्रेम कहानियां , प्रेम पर सर्वाधिक फिल्म बनाने वाले पर वास्तविकता यह है ‌ कि हम सामाज के रूप में  प्रेम विहीन हैं । हम शक्ति के‌ लिए, नियंत्रण के लिए लड़ने वाले बर्बर किन्तु बहरूपिए समाज का हिस्सा हैं । वह समाज जो अमनावीय आदर्शों की स्थापना में विकृत मनुष्य-निर्माण में रत है । जो इंसान की साधारण कमियां स्वीकार करने की बजाय उसे इतना सताता है कि हर चेहरे पर एक चेहरा नजर आने लगा है ,एक अपना चेहरा दूसरा सामाजिक चेहरा। इंसान इंसान होते हैं , उन्हें देवी देवता बनाने की कोशिश उनसे उनका सर्वस्व उनकी सहजता छीन लेना है ।


हम उस समय मुठ्ठी भींच लेते हैं ,मीन मेख निकाल लेते हैं ,जब कोई नौजवान अपनी प्रेमिका को अपनी प्रेरणा कह रहा होता है। वो इस सड़ी गली मानसिकता का पुरजोर विरोध कर रहा होता है ,वो उस सोच‌ पर थूक रहा होता है जो प्रेम को पतन का कारण मानती है। प्रेम हमेशा उत्थान का कारक है , यदि वह वास्तव में प्रेम हो तो । वासना के अंधविरोध में भारतीय समाज प्रेम का महत्व भूल गया है। भावनाओं का सही निष्पादन न होने के कारण हम एक कुंठित समाज में रह रहे हैं । जहां उच्च शिक्षित व ऊंची पदवियों पर विराजमान लोग भी पत्नी के साथ बलात्कार को सही मानते हैं। आखिर सवाल यह है ,कि संविधान में जब लिंग आधारित भेदभाव को कोई स्थान नहीं मिला तो फिर ऐसी बातें कहने वाले कानूनविद किस आधार पर अनर्गल प्रलाप करते हैं ? यह कौन सी संस्कृति है जिसकी सुरक्षा की जा रही है ,और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि किसके हित के मद्देनजर की जा रही है ?


ऐसे समय में जब पत्नी की हैसियत सैक्स गुलाम की तरह परिभाषित की जा रही हो , कोई युवा अपनी गर्लफ्रेंड को प्रेरणा कहता है तो स्वागत योग्य ही कहा जाएगा। उससे भी अधिक आह्लादित करने वाली बात यह होगी कि कोई स्त्री अपनी अकादमिक सफलता का श्रेय अपने पुरुष साथी को दे ।


समाज की बहुत सारी व्याधियों का कारण समाज में स्त्री पुरुष की समान सहभागिता न होना भी है। कितनी धीमी गति से सीखता है हमारा समाज। ज्योतिबा फुले के आधुनिक विचारों तक पहुंचना तो दूर सोचने तक से हिचकता है । पढ़े लिखे पुरुष अपनी जीवनसंगिनी को पढ़ाने से यह सोचकर डरते हैं कि उन्हें सम्मान नहीं मिलेगा , उनकी पूछ कम हो जाएगी , उनकी घरेलू जिम्मेदारी बढ़ जाएगी । वो यह नहीं सोच पाते कि ज्योतिबा और सावित्री मां की तरह वो एक साथ एक राह पर आगे बढ़ पायेंगे । यह कौन सी संस्कृति है जिसका गुजारा दूसरे का व्यक्तित्व निगले बिना संभव नहीं होता ।


जिस समाज में महिला ही नहीं पुरुष भी इतने निरिह हैं कि जीवनसाथी चुनने के लिए माता पिता का मुंह ताकते हैं ,चाहे वे सरकार चुन सकते हैं , व्यवसाय या नौकरी चुन सकते हैं। अपनी पत्नी की प्रशंसा करते हुए उन्हें परिवार के रूठने का डर सताता है। घर के काम से थकी पत्नी से उनकी सहानुभूति रहती है , लेकिन चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पाते। और इस मजबूरी को हम साथ साथ हैं जैसी फिल्में किस खूबसूरती से भुनाती हैं। अरे यह कैसा प्रेम जो पूरे समाज के सामने पत्नी को पीटने को पौरुष का प्रतीक समझता है । और उसकी मदद को हेठी मानता है।


जब कोई पति अपनी पत्नी की तारीफ करता है उसके श्रम के महत्व को सामाजिक जीवन में खुले मन से स्वीकार करता है ,और स्त्री पर बने चुटकुले नकार देता है , तो उसकी इस खुलदिली का स्वागत किया जाना चाहिए , ना कि उसे जोरू का गुलाम कहकर उसका मजाक उड़ाया जाना चाहिए। जब एक स्त्री अपने पूरे परिवार का त्याग करके पुरुष के परिजनों को अपना लेती है ,उसी की गृहस्थी में रम जाती है , उसके अनुसार खाती पीती , पहनने ओढ़ने के वावजूद गुलाम नहीं आदर्श पत्नी , अर्थात गऊ जैसी पत्नी कहलाती है ,तो फिर स्त्री का सामान्य सा पक्ष लेने पर जीवनसाथी मजाक का विषय क्यों बन जाता है ?


इस संस्कृति को स्थापित  करने में भारतीय सिनेमा ने , टीवी ने पूरा योगदान दिया है। आदर्श वादी गूंगी पत्नियों की खेप तैयार करने में , त्याग की मूर्ति गढ़ने में इसका बड़ा हाथ है। समाज को विकलांग बना दिया गया है , जो एक टांग से विकास की दौड़ में विजयी होना चाहता है । यहां योग्यता पर लिंग का अंतर भारी पड़ता है। स्त्री को महत्वकांक्षी नहीं होना चाहिए इस आशय पर सैकड़ों फिल्म और धारावाहिकों का निर्माण हो चुका है । अपना अधिकार मांगने वालियों को पतिता के रूप में स्थापित किया जा चुका है । 


जब कोई पिता जो दहेज़ की जगह अपनी बच्ची की शिक्षा का प्रबंध  कर रहा होता है तो वो पूरी व्यवस्था से विद्रोह कर रहा होता है। वह व्यवस्था जो स्त्री को मात्र दो घरों का उजाला बनाने तक सीमित रखना चाहती है। वह व्यवस्था जो उसे आर्थिक मजबूती नहीं देना चाहती , जिसका मानना  है कि अधिकार पाने से स्त्री बिगड़ जाती है। और यह बिगड़ना क्या है ? पुरुषों के साथ एक कार्यालय में काम करना , हंस बोल लेना , उनसे लिफ्ट ले लेना ? आखिर क्या सुरक्षित किया जा रहा है ? कौमार्य , किसके लिए ? एक पुरुष के लिए ताकि वो स्त्री को चरित्रहीन न समझ ले ! ताकि वो स्त्री का बोझ उम्र भर उठा ले।

यह समाज स्त्री के लिए कितना संवेदनहीन है जो पल पल उसे दोयम दर्जे का होने का अहसास दिलाता है । उसकी महत्वकांक्षा को रंग गोरा करने तक , कद लम्बा करने तक ही सीमित कर देता है ताकि वो लड़के को , उसके परिवार को भा जाए । और उसकी शिक्षा की जगह दहेज की निधि चुनी जाती है। घरेलू काम काज में उसकी दक्षता उसकी सुंदर लिखाई से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती  है। अभी भी वो इंसान नहीं संतति बढ़ाने वाली वस्तु के रूप में समाज का हिस्सा है । जो पिता इस सोच का सार्थक विरोध करते हैं उनका स्वागत किया जाना चाहिए ।  प्रथा और रूढ़ियों के उनके विरोध का तरीका डोली में बिठाते समय रोने तक सीमित नहीं होता , उसका विरोध गुंडों को पीटने तक ही नहीं होता बल्कि वो सांकेतिक भाषा हो जाता है ,जो उसके व्यवहार में झलकता है।


अपनी बहनों के निजी जीवन का सम्मान करने वाले भाई तीसरी दुनिया में कितने कम हैं,जो यह मानते हैं कि विवाह करना या ना करना बहन का निजी निर्णय है। बहुसंख्यक वो हैं जो छोटे होने के वावजूद उन पर हाथ उठाते हैं , उनके पहनावे पर उंगलियां उठाते हैं , उन्हें कलंकिनी मानते हैं , उनके प्रेमियों को मारते पीटते हैं , उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाते हैं।


आखिर विक्षिप्त लोगों की इतनी फौज कहां तैयार हो रही है , जो स्त्री के प्रति इतनी घृणा से भरे हैं। जिन अंगों से जन्म लिया है उन्हें दिन रात कोसने ,गाली देने वाले निक्कमों की संख्या बढ़ ही रही है। जो स्कूल कालेज जाने वाली लड़कियों के साथ इस आशय से छेड़छाड़ करते हैं कि वे फेल हो जायें। जो वेश्यालयों में इसलिए औरतों को सजाते हैं कि उनका शोषण किया जा सके। जो घर से बाहर निकलने वाली हर स्त्री को चरित्र प्रमाण-पत्र बांटते फिरते हैं। जो दुल्हन की खरीद भेड़ बकरी की तरह करते हैं। जिन्हें बलात्कार की मानसिकता में छह महीने की बच्ची और अस्सी साल की वृद्धा एक मादा दिखाई देती हैं। मानसिक और शारीरिक हर तरह से स्त्री का मनोबल तोड़ने वाले जब संस्कृति के नाम पर उसे पर्दों में लपेटते हैं ,तो दोमुंहे सांप लगते हैं।

  
भले होते हैं वो लोग जो इन संस्कृति के स्वयंभू संरक्षकों से लड़ते हैं , जो सांकेतिक भाषा में इन्हें चुनौती देते हैं। विरोध करने और उसकी भाषा समझने के लिए हृदय में प्रेम होना बहुत जरूरी है । स्त्री को नर्क का द्वार कहने वाले उसके हितों की रक्षा करेंगे ऐसा सोचने वाले बौद्धिक मूर्खो की संसार में  कमी नहीं है। हर कोई संसार को बेहतर बनाना चाहता है ,पर शुरुआत दूसरे से करना चाहता है ,पर जो शुरुआत खुद से करते हैं , और समर्थ होकर भी दूसरे को सम्मान देते हैं ऐसे लोग बड़े प्यारे लगते हैं ‌।