मुद्दे स्त्री-विमर्श

‘नाम’ नहीं है औरत की पहचान

मेरी दादी का नाम दमयंती था, हांलाकि मैंने यह बहुत बाद में जाना। वो दादी थीं, घर भर में दादी बुलाई जातीं। हो सकता है खुद उनके बच्चे भी न जानते हों अपने बचपन में। माँ तो माँ होती है, अब भी बहुत से बच्चे नहीं जानते होंगे अपनी माँ का नाम। शहरों में, एकल परिवारों में रहने वाले और अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे ज़रूर जानते हैं। मगर आज भी बहुत से आवेदनों में, खासकर नौकरी के आवेदनों में माँ के नाम का कॉलम नहीं होता है, फादर्स/हस्बैंड्स नेम होता है, पिता का नाम पहचान है, शादीशुदा लड़कियों के लिए पति का नाम, माँ कभी भी किसी के लिए ऑफिशियल पहचान नहीं होती है।

तो मुझे दादी का नाम नहीं पता था, बड़ी माँ का नाम भी नहीं पता था, वो या तो माँ या बड़ी माँ थीं, या फिर दुल्हैन, सुगंधा पुकार नहीं सुना कभी उनके लिए। बाबा माँ और चाची को नाम से पुकारते थे, मगर बड़ी माँ को दुल्हैन ही कहा सब दिन। बड़ी माँ खुद भी अपनी दोनों बहुओं को ज़्यादातर बड़की दुल्हैन छोटकी दुल्हैन ही पुकारती हैं।

कई बार नाम से भी बुलाती हैं, उनके बारे में बताना हो तो नाम लेती हैं। नानी भी छोटी मामी को नाम से बुलाती हैं मगर बड़ी मामी को राजू की बहू ही कहती हैं, शेषा नहीं कभी भी।

हमारे यहां किराये पर जो आंटी रहती थीं उनके दो लड़के थे, छोटे की शादी नहीं हुई थी मगर आंटी बड़े लड़के की पत्नी को बड़की बुलाती थीं।

[“गरज़ कि हमारे समाज में या तो यह होता है कि मैके वाले दहेज़ देकर बेटी से अपना दिया हुआ नाम छीन लेते हैं या फिर ससुराल वाले गवारा नहीं करते कि उनके यहां किसी और घर का दिया हुआ नाम चले” (आधा गांव से)]

अब भले हालत बहुत बदली हों, मगर आज भी नाम से पुकारा जाना कितना बड़ा सुख है यह कोई उन बेनाम लड़कियों से पूछें जो शादी होते ही अपना नाम छोड़ बहू, भाभी, चाची और मामी हो जाती हैं।

 

(लेखिका- स्वाति शबनम)