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‘मोदी एरा’ जातिवादी भारतीय समाज के लिए एक अहम् पड़ाव है


हमारे भीतर पलती कुंठाएं और नकारात्मक भावनाएं अनुकूल परिस्थितियां पाते ही बाहर फूट पड़ती हैं। भारतीय समाज घोर जातिवादी मानसिकता, जातीय घृणा और कुंठा से ग्रसित समाज है। जातिव्यवस्था के पदानुक्रम में जो जिस स्थान पर नियत किया गया है वह अपने नियत स्थान से नीचे वाले के प्रति हीन भावना रखता है, और अपने से ऊपर वाले की चिरौरी करता है। या उसके स्थान पर पहुँचने को लालायित रहता है। मगर अंदर ही अंदर उससे नफरत भी करता है। कुछेक लोग अपवाद स्वरुप इससे खुद को बचते हुए, लोगों को एक इंसान के तौर पर देख पाने की क्षमता विकसित कर पाते हैं। लेकिन ऐसे लोग अपवाद स्वरुप ही हैं।

इस पदानुक्रम में जो जितना ऊपर है वह उतना ही ज़्यादा सामंती, क्रूर और संवेदनहीन है। और जो जितना नीचे है वह उतना ही शोषित, दब्बू, गुलाम मानसिकता का और प्रतिक्रियावादी है।

देश से अंग्रेजों के जाने पर इस जातिवादी पदानुक्रम में जो जितना ऊपर बैठा हुआ था, उसे उतनी ज़्यादा ख़ुशी हुई थी। क्योंकि यह उस वक़्त का अनकहा सच था कि सत्ता का स्वरुप अब जातिव्यवस्था के अनुसार तय होगा। और कुछ हद तक ऐसा हुआ भी। यहाँ तक कि हिन्दू कोड बिल पास नहीं हो पाया जिसके चलते बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने कानून मंत्री पद से स्तीफा भी दिया। फिर भी उस वक़्त के नीति नियंताओं और लोकतान्त्रिक सोच के नेताओं ने अपने अथक प्रयासों से जातिवाद का नंगा नाच होने से न सिर्फ रोका बल्कि लगातार जातिवाद को कमजोर भी किया।

इसे आप इससे नाप सकते हैं कि 70 साल पहले देश की महिलाओं/ शोषितों की सामाजिक स्थिति दुनिया के अन्य देशों की महिलाओं/शोषितों की सामाजिक स्थिति के बीच क्या अंतर था और आज भारत की महिलाओं/ शोषितों की सामाजिक स्थिति और दुनिया के अन्य देशों की महिलाओं/शोषितों की सामाजिक स्थिति के बीच कितना अंतर है। आप पाएंगे कि महिलाओं और शोषितों की स्थिति तुलनात्मक रूप से काफी बेहतर हुई है। हाँ स्थिति के बेहतर होने की गति को लेकर बहस हो सकती है, लेकिन निसंदेह इस और गति रही ज़रूर।

लेकिन जातीय लाभ एक प्रिविलेज है जो पीढ़ियों से लोग भोग रहे हैं। जाहिर है जब किसी का प्रिविलेज छीना जायेगा तो उसे तकलीफ होगी।जब कोई प्रिविलेज आप पीढ़ियों से भोगते चले आते हैं तो आप उसे अपना हक़ समझने लगते हैं। इसलिए जातीय पदानुक्रम में ऊपर बैठी जातियों के लोग लगातार छिनते इस प्रिविलेज से अंदर ही अंदर घृणा और कुंठा पाले हुए थे। जब एक ऐसी सरकार सत्ता में आई जिसने घोषित-अघोषित रूप से इन लोगों की छिपी भावनाओं और कुंठाओं को उकसाना शुरू किया तो ये कुंठाएं बाहर आने लगीं।

कुंठाओं और जातीय नफरत का बाहर आना आज लगभग हर क्षेत्र में दिखाई देता है। लेकिन पत्रकारों द्वारा जब इस कुंठा और जातीय विद्वेष की नुमाइश होती है तब यह ज़्यादा मुखर और प्रत्यक्ष दिखाई देने लगता है। पत्रकार जिसे व्यावसायिक तौर पर भी निष्पक्ष होना चाहिए, जब वह अपने भीतर पलती जातिगत कुंठाओं का प्रदर्शन करने लगे तो इसके दो ही मायने हैं, या तो वह कठपुतली के रूप में किसी की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ऐसा कर रहा है या फिर वह स्वयं अंदर से इस जातीय घृणा और कुंठा से ग्रसित है। दोनों ही परिस्थतियों में वह घोर संवेदनहीन है और पत्रकारिता के लायक नहीं है।

पत्रकारों की बौद्धिक सीमा और संवेदनशीलता का क्या आलम क्या है यह पिछले कुछ सालों में हम सबने देखा है। 2000 के नोट में लगी चिप से लेकर दूध पीने वाली चुड़ैल और हर दूसरे दिन बगदादी की मारने से लेकर बेवजह हिन्दू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान करने वाले एंकर घोर साम्प्रदायिक और मूढ़ नज़र आते हैं। साथ ही साथ अपनी हरकतों, बयानों पब्लिक प्लेटफॉर्म पर कही गयी अपनी बातों से ये घोर जातिवादी कुंठाओं का प्रदर्शन भी करते हैं।

हाल की घटना है जब आज तक के एंकर निशांत चतुर्वेदी ने ट्वीट किया, जिसमे उसने बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के बारे में कहा कि वो तीन बार ट्विटर बोलकर ही दिखा दें। यह बयान कई सारे मनोवैज्ञानिक कारणों से आया है। निशांत अपने ब्राह्मण होने के गर्व में चूर है और वह राबड़ी देवी के पिछड़ा होने और महिला होने को लेकर इस बात को पचा नहीं पा रहा कि वह देश के दूसरे सबसे बड़े सूबे की 8 साल मुख्यमंत्री रहीं। अधिकांश ब्राह्मण इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे कि कोई शूद्र अछूत कैसे शासन/प्रशासन सम्हाल सकता है। ऊपर से अगर वह महिला है तब तो बात बिलकुल ही अपच हो जाती है। यही कारण है कि सबसे ज़्यादा घृणित और ओछे स्तर के हमले उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर किये जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि इनकी घृणित जातिवादी कुंठा का शिकार सिर्फ शूद्र और अछूत नेता ही हैं। वो सवर्ण नेता जिन्होंने जातीय घृणा से ऊपर उठकर समाज के हित में शोषित वंचित लोगों के लिए कुछ बेहतर किया या करने का प्रयास किया, इनके निशाने पर वो सवर्ण भी रहते हैं। चाहे वे वीपी सिंह हों या चरण सिंह हों। और ऐसा भी नहीं है कि हर सवर्ण ऐसी जातीय कुंठा से ग्रसित है लेकिन ऐसे सवर्णों की संख्या कम है।

राबड़ी देवी ने क्या किया क्या नहीं किया यह सवाल करना सबका लोकतांत्रिक अधिकार है, पत्रकार का तो यह कर्तव्य है कि हर नेता से उसके किये कामों को लेकर सवाल करे। और सवाल करने भी चाहिए यही लोकतंत्र का तकाजा है। हर प्रदेश के नागरिक का अधिकार है अपने मुख्यमंत्री से सवाल करने का। देश के हर नागरिक को अधिकार है अपने प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा करने का उससे सवाल करने का। लेकिन राबड़ी देवी से इस तरह के सवाल करना कि ‘तीन बार ट्वीट बोलकर बताएं’, यह भयानक है। इससे जातीय कुंठा की बू आती है।

पत्रकारिता इसके पहले इस निचले स्तर पर कभी नहीं थी। यहाँ तक कि जवाहर लाल नेहरू के बारे में एक बात कही जाती है, वह कितनी सच है कितनी झूठ यह अलग बात है , लेकिन कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वे अखबारों में अक्सर किसी छद्म नाम से अपने खिलाफ और सरकार की नीतियों के खिलाफ लेख लिखते थे ताकि पत्रकारिता में लोकतंत्र की नींव पड़ सके। लेकिन 2014 में आई भाजपा सरकार जिसे यही मीडिया और पत्रकार ‘मोदी एरा’ कहते हैं, इसमें पत्रकारों ने पत्रकारिता के स्तर को इतना गिरा दिया है कि हर रोज़ यह लगता है कि अब इससे ज़्यादा क्या गिरेगा। लेकिन अगले ही दिन वह एक लेवल और गिरा हुआ मिलता है। पत्रकार राजदीप सरदेसाई का GSB प्राइड वाला बयान सबको याद ही होगा।

यह ‘मोदी एरा’ जातिवादी भारतीय समाज के लिए एक अहम् पड़ाव है जहाँ हर क्षेत्र हर जगह लोग अपने अंदर की जातीय कुंठाओं को बाहर लिए उसका अश्लील प्रदर्शन कर रहे हैं। यह ‘मोदी एरा’ जातिवादी भारतीय समाज की जातीय कुंठाओं के खुलकर बाहर आ जाने के लिए याद किया जायेगा। 

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