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“मिलेनियम बॉयज” क्रिकेट के देश में फुटबॉल को जीवित रखे है ये लड़के

आबादी के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर रहने वाले भारत को फुटबॉल विश्वकप में खेलते देखना उन ‘हज़ारों ख्वाहिशों’ में से एक है, जिन्हें ‘दम निकलने’ से पहले पूरी होते देखना चाहता हूँ।

भले ही अंडर-17 विश्वकप में असली विश्वकप सरीखा ग्लैमर और प्रतिस्पर्धा न मौजूद हो, इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि फीफा के 113 वर्ष के इतिहास में पहली बार फीफा द्वारा आयोजित किसी टूर्नामेंट में भारतीय टीम खेलने जा रही है (यहाँ विश्वकप क्वालीफाइंग दौर में होने वाले मैचों को न गिना जाए)।

ये दीगर बात है कि इस बार हमारी टीम अंडर-17 विश्वकप में भी महज आयोजक देश होने की वजह से भाग ले पा रही है न कि अपनी योग्यता और कौशल के बूते।

Football in Savoi-Verem

चार वर्ष पहले, जब भारत को इस टूर्नामेंट की मेजबानी मिली थी तो भारतीय फुटबॉल फेडरेशन के पास न कोई प्लान था और न ही रिसोर्स। तब से अब तक भारतीय फुटबॉल में बहुत परिवर्तन आया है।

आईएसएल के प्रादुर्भाव ने भी बहुत कुछ बदला है। 2015 में जर्मनी के निकोलाई एडम को प्रस्तावित अंडर-17 टीम का कोच नियुक्त किया गया (गौरतलब है कि अभी छः माह पहले इन्हें हटाकर पुर्तगाल के लुई नॉर्टन डी माटोस को नया कोच नियुक्त किया गया है)।

देश के कोने-कोने से फुटबॉल के ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की खोज की गई, जिनका जन्म 1 जनवरी 2000 के बाद हुआ हो (इसी वजह से मैं इन खिलाड़ियों को “मिलेनियम बॉयज” कहता हूँ) और एक स्थूल टीम बनाई गई।

अगले दो वर्ष तक इन खिलाड़ियों को कड़ा प्रशिक्षण दिया गया। एक्सपोज़र टूर आयोजित किए गए और इस दौरान इन खिलाड़ियों ने चार महाद्वीप- 18 देशों में करीब दो लाख मील का सफ़र कर सौ से ज्यादा मैच खेले।

एक अनुमान के अनुसार सिर्फ इन खिलाड़ियों पर ही फेडरेशन 15 करोड़ तक खर्च कर चुका है। पर फिर भी ये कहना जल्दबाजी होगी कि ये टीम विश्वकप के लिए पूरी तरह तैयार है, क्योंकि जिन खिलाड़ियों/टीम से मुकाबला है, वे कई दर्जे बेहतर अनुभव और प्रशिक्षण से लैस हैं। अब देखना है कि मिलेनियम बॉयज कितना अच्छा प्रदर्शन कर पाते हैं।

आइये मिलेनियम बॉयज में से कुछ का परिचय करा दें-

मणिपुर के थाउबल जिले की हाओखा ममांग गांव के अमरजीत सिंह कियाम के पिता किसान हैं और खाली समय में बढ़ई का काम करते हैं। जबकि उनकी माँ गाँव से 25 किलोमीटर दूर जाकर मछली बेचने का काम किया करती हैं, ताकि अमरजीत की जरूरतें पूरी कर सकें।

मिडफील्ड में विपक्षी खिलाड़ियों के मूव को इन्टरसेप्ट करने और अपने फॉरवर्ड्स को सटीक पास देने के क़ाबिलियत की वजह से चर्चित रहे अमरजीत को कोच डी माटोस के सुझाए गए तरीके – टीम मेम्बर्स के द्वारा गुप्त मतदान – के जरिये भारतीय टीम का कप्तान चुना गया है. कल यानी छः अक्तूबर को जब अमेरिका की टीम के खिलाफ अपनी टीम लेकर अमरजीत मैदान पर उतरें तो वे किसी भी फीफा वैश्विक टूर्नामेंट में खेलने वाले पहले भारतीय कप्तान थे.

बचपन में अपने पैरेंट्स की टेलर शॉप से कपड़े की कतरनों को इकठ्ठा कर उनकी गेंद बनाकर फुटबॉल खेलने वाले कोमल थाटल आज इस टीम के विंगर/अटैकिंग मिडफील्डर हैं. पश्चिम सिक्किम के सोरेंग सुब-डिवीज़न के अनजाने से गाँव तिनबरबंग के कोमल थाटल पिछले साल ब्रिक्स कप में ब्राज़ील के खिलाफ गोल दागकर किसी भी स्तर के मैच में ब्राजील के विरुद्ध गोल करने वाले पहले भारतीय बन चुके हैं. ये दीगर बात है कि विनीशियस जूनियर (जिसे उनके क्लब – फ्लेमेंगो – ने इस विश्वकप में खेलने की इजाजत नहीं दी) के प्रेजेंस में उस मैच में ब्राज़ील की टीम ने भारत को 3-1 से शिक़स्त दी थी.

मूल रूप से उत्तराखंड के रहने वाले और फिलहाल कोलकाता में आ बसे जीतेन्द्र सिंह टीम में डिफेंडर की पोजीशन पर खेलते हैं. जीतेन्द्र के पिता वाचमैन का काम करते हैं और माँ दरजी का. शुरू-शुरू में जितेन्द्र को क्रिकेट का शौक था पर पैसे नहीं थे क्रिकेट की महँगी किट खरीदने के लिए, तो फुटबॉल अपनाया.

कर्नाटक के संजीव स्टालिन टीम में डिफेंडर हैं और डेड-बॉल स्पेशलिस्ट यानी फ्री-किक लेने में माहिर हैं. उनके पैरेंट्स की रोडसाइड जर्सी – होजरी शॉप है. पश्चिम बंगाल के बंडील के रहने वाले अभिजित सरकार टीम के एक और मिडफिल्डर हैं. उनके पिता रिक्शा-वैन ड्राईवर हैं और माँ एक छोटी सी परचून की दूकान चलाती हैं. अभिजित इस टीम के लिए क्या अहमियत रखते हैं इसे बताने के लिए इतना ही काफी होना चाहिए कि उन्हें 10 नम्बर की जर्सी दी गयी है. वहीं महाराष्ट्र के कोल्हापुर से आये टीम के एक फॉरवर्ड – अनिकेत जाधव – के पिता ऑटो-रिक्शा चलाते हैं.

अन्य मिलेनियम बॉयज की कहानियाँ भी मिलती – जुलती ही हैं. विश्व कप मैचों के परिणाम तो भविष्य के गर्भ में छिपे हैं, पर इन खिलाड़ियों ने ये तो साबित कर ही दिया है कि परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल हों, आपकी प्रतिबद्धता और लक्ष्य तक पहुँचने के दृढ़-निश्चय के आगे आखिरकार थक-हारकर हथियार डाल ही देती हैं. उम्मीद करते हैं कि भारतीय अंडर – 17 टीम और फ़ीफ़ा अंडर – 17 विश्वकप उस बदलाव को लाने में सफल होंगे जिस इन्क़लाबी तब्दीली की भारतीय फुटबॉल आस लगाए बैठा है.

 

(लेखक- विशी सिन्हा)

 

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