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अपने बचाव में बेहद बचकाना और हास्यास्पद तर्क दे रहे हैं गोगोई

गिरीश मालवीय-

न्याय की देवी अंधी नहीं होती लेकिन उसकी आँखों पर पट्टी जरूर बंधी दिखाई देती है. और इस बात का सिर्फ एक ही मतलब है कि कानून के समक्ष भी सब समान हैं. आरोपी का रुतबा देखे बगैर उसके अपराध को देखा जाए ओर न्याय किया जाए.

संविधान के अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात कहता है, कानून के समान संरक्षण की बात करता है. इसका तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति को किसी विशेष विशेषाधिकार नहीं मिलेगा। सभी विषय सामान्य कानून में बराबर हैं।ओर समान परिस्थितियों में उपचार की समानता की गारंटी रहेगी.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने ऊपर यौन शोषण के आरोपों को जिस गलत ढंग से हैंडल किया है उससे इस संवैधानिक अधिकार का कोई अर्थ नही रह गया है.

पीड़िता ने गंभीर आरोप लगाए हैं और गोगोई साहब इन आरोपों का सीधा सामना करने के बजाए बात बदलने की पूरी कोशिश में लगे हैं. अब तक के उनके दिए गए तर्क इतने हास्यास्पद है कि यही तर्क कोई अन्य मुलजिम उनके सामने रखता तो वो उसकी फाइल उठाकर फेंक देते.

खैर दो दिन पूर्व अन्ततः इस केस में सुप्रीम कोर्ट में एक समिति बनाई गई. चूंकि मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम पद पर हैं, इसीलिए पीड़ित महिला ने ही जांच कमेटी में रिटायर्ड जजों की मांग की थी. लेकिन इन तीन जजों की इस कमेटी में वरिष्ठता की हैसियत से मुख्य न्यायाधीश के ठीक बाद आने वाले जस्टिस बोबड़े और जस्टिस रामना को शामिल किया गया. साथ ही सिर्फ एक महिला जज, जस्टिस इंदिरा बैनर्जी को शामिल किया गया. दरअसल ये सभी जज मुख्य न्यायाधीश से जूनियर हैं.

इस समिति की जानकारी जब उस महिला को लगी तो उसने विशाखा गाइड लाइन के दिशानिर्देशों और POSH अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जांच समिति में बहुमत वाली महिला सदस्य और एक बाहरी सदस्य नहीं है जैसा कि कानून द्वारा अनिवार्य है.

महिला ने जांच पैनल में जस्टिस एन. वी. रमण की मौजूदगी पर इस आधार पर आपत्ति जाहिर की कि वह सीजेआई के करीबी मित्र हैं और उनके घर पर उनका बराबर आना-जाना होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए कल शाम रमन्ना की जगह सुप्रीम कोर्ट की महिला जज इंदू मल्होत्रा को शामिल किया गया हालांकि उनकी नियुक्ति भी रंजन गोगोई के कार्यकाल में हुई थी जो काफी विवादास्पद बनी लेकिन अब CJI के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट इन हाउस जांच पैनल में दो महिला जज शामिल हो गईं हैं.

इस पूरे प्रकरण में वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है उनका कहना है कि CJI गोगोई से सभी प्रशासनिक और न्यायिक जिम्मेदारी ले लेनी चाहिए. 
वो कहती है कि “क़ानून भी ये कहता है की इम्प्लॉयर की पीड़िता की तरफ़ ज़िम्मेदारी बनती है कि वो जांच और न्याय प्रक्रिया में उनका साथ दें.”

इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट की उतनी ही जिम्मेदारी उस महिला के प्रति भी बनती है जितनी CJI के प्रति क्योंकि वह महिला भी सुप्रीम कोर्ट की कर्मचारी रही है यह बहुत महत्वपूर्ण पॉइंट है.

इस जांच के बावजूद सुप्रीम कोर्ट का रुख गोगोई साहब के पक्ष में झुका हुआ दिख रहा है. उन्होंने उत्सव सिंह बैंस के हलफनामे पर सुनवाई के लिए एक अलग पैनल गठित की है. जबकि इंदिरा जयसिंह का मानना है कि दोनों हलफनामों पर जांच एकसाथ चलनी चाहिए, क्योंकि दोनों मामले एकसाथ जुड़े हैं.

इंदिरा जयसिंह ने अपनी दलील में कहा कि यौन उत्पीड़न का आरोप तो पहले ही नकारा गया है जिसकी जांच होनी है. चूंकि साथ ही साजिश का भी मुद्दा जुड़ा है, लिहाज़ा दोनों मामलों की जांच एकसाथ होनी चाहिए. इस पर कोर्ट ने कहा कि दोनों मामलों आरोपों की जांच हो रही है. फिक्सर आसपास खुलेआम घूम रहे हैं. न्यायपालिका की साख पर बट्टा लगाने की मंशा से वकीलों से सम्पर्क कर रहे हैं. ये ज़्यादा गम्भीर है.

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि मैं साफ कर दूं कि मैं किसी की पैरवी नहीं कर रही हूं. इन हाउस जांच कानून के किस प्रावधान के तहत हो रही है मैं नहीं जानती. CJI के खिलाफ इतना बड़ा आरोप है और इसके पीछे साजिश के सुराग भी तो जांच इसी आधार पर होगी. इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि मामला गंभीर है. अभी हम ये भी नहीं कह रहे कि हलफनामा गलत है. कोर्ट ने कहा कि आप क्यों एंगर हैं? जवाब में इंदिरा जयसिंह ने कहा कि मैं एंग्विश ( पीड़ित ) हूं.

दरअसल वकील उत्सव बैंस के हलफनामे में कहा गया है कि अजय नाम का शख्स उनसे मिला. उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि आरोप लगाने वाली महिला और कुछ अन्य रजिस्ट्री कर्मचारियों के साथ तपन चक्रवर्ती और मानव शर्मा द्वारा एक साजिश रची गई थी. साफ है कि दोनों जाँच एक ही विषय की हो रही है इसलिए एक ही समिति इन आरोप की जांच करती तो ज्यादा ठीक होता.

महिला ने कल सर्वोच्च अदालत द्वारा गठित इन हाउस पैनल को पत्र में लिखा कि, ‘मेरे चरित्र का हनन, मुझे सुने जाने का मौका देने से पहले ही कर दिया गया’.

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