मुद्दे सोशल

हम स्वतंत्र और समान हैं, केवल कानून की किताबों में

बोला गया स्वतंत्रता
लगा, मिल गई सबको स्वत्रंत्रता

‘न्याय’ शब्द आया भाषण में
लगा जनता को न्याय मिल गया

समतल धरती का एक कोना दिखा
लगा समानता आ गई

स्वतंत्र महसूसती हुई एक लड़की
मिनी स्कर्ट पहन कर
घूमने गई कनाट प्लेस में
लेकिन ,गड़-सी गई शरीफ़ों की आँख में
कुछ इशारे हुए
कुछ फब्तियाँ कसी गई
और किताबी स्वतंत्रता धरी रह गई

एक बेटी ने
समान बनकर ,
अपने भाई के संग चलना चाहा
सपनों के हवाई जहाज़ पर उड़ना चाहा
पर बोला गया
बेटी तो पराया धन होती है
बेटी, बहू और दुल्हन होती
भाई को आगे बढ़ने दे
बड़े सपने देखने दे
तू तो झाड़ू लगाना सीख
खाना बनाना सीख
पति का घर संभालना सीख

कितने ही लोग गाँवों में
वनों में
महानगर की गलियों में
खुद को समान मानते हुए
चाह रहे हैं समानता
जीवन के विविध आयामों में
सामाजिक परंपराओं में
न्याय के भवनों में
सरकारी निगाहों में
लेकिन
उन्हें बोलने नहीं दिया जाता
उन्हें चलने नही दिया जाता
उन्हें उजाड़ दिया जाता है विकास के नाम पर ।

वोट देने का अधिकार समान है
लेकिन
क्या मीडिया घरों की बाज़ीगरी से
ईवीएम हैकिंग की जादूगिरी से
और अपराधियों एवं नेताओं की दादगिरी से
स्वतंत्र
चुनाव होता है

क्या हम स्वतंत्र हैं ?
अपनी आस्था चुनने को
जाति के कवच से बाहर निकलने को
क्या रात के अंधेरे में
अंजान ,सुनसान गलियों में
कोई पुरूष या नारी अकेले जा सकती है ?
बिना डरे हुए
बिना किसी को साथ लिए हुए

हम स्वतंत्र और समान नहीं है
न घर में
न समाज में
न कार्यालयों में
और न ही न्यायालयों में
हम स्वतंत्र और समान हैं
केवल कानून की किताबों में।

 

(तेज प्रताप)

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