मुद्दे सोशल

भारत में क्‍या है अछूत लड़की होने के मायने?

जब तक होश नहीं संभाला था, पता ही नहीं था कि मैं एक अछूत परिवार में जन्मी हूँ। औऱ भारतीय समाज में अछूत लड़की होने के क्या मायने हैं।

पहली बार जातिभेद तब झेला जब मैं मात्र 3-4 साल की थी

एक ग़रीब परिवार की बच्ची के लिए खीर-पूड़ी बहुत बड़ी बात थी। खीर-पूड़ी खाने की लालच में नवरात्रों में होने वाले कन्याभोज में जाने पर सवर्ण परिवारों के यहाँ कई बार गई पर उन्होंने कभी अपने घर के अंदर आने नहीं दिया।

अछूत बच्चियाँ डाँट और हिक़ारत के साथ गेट के बाहर ही रोक दी जाती। सवर्ण लड़कियों को उनके पैर धुलाकर महावर लगाकर कन्या भोज कराया जाता।

उस जूठन को भी हम बड़े चाव से खाते थे

गेट के बाहर खड़ी हम अछूत लड़कियाँ ललचाई नज़रों से अपनी बारी आने का इंतज़ार करते। सवर्ण लड़कियों को खिला देने के बाद उनका छोड़ा हुआ झूठा खाना दूर से ही ख़ाकरों या शीशम के पेड़ के पत्तों या अख़बार के पुर्ज़ों में दिया जाता। तब उस जूठन को भी हम बड़े चाव से खाते थे, इस भाव से कि पता नहीं आगे कब खीर-पूड़ी खाने मिले।
  • हमें भीतर क्यों नहीं बुलाया जाता ?
  • क्यों बर्तनों की बजाय पत्तों या पेपर में खाना मिलता ?
  • क्यों हमें जूठन दी जाती ?
  • हमें दूर से फेंककर खाना क्यों दिया जाता?
  • क्यों हम आखिरी में खाना खाएंगे ?
  • दूसरे लोग हमसें दूर से क्यों रहते हैं?
  • क्यों हमें लोग हिक़ारत भरी नजरों से देखते हैं ?
इन तमाम सवालों के जवाब बहुत छोटेपन में ही समाज ने दे दिए थे कि मैं एक ‘नीच जाति’ की लड़की हूँ। यह घटना आज भी ज़ेहन में उतनी ही ताज़ा है।
मध्यमार्ग से जुड़ने के लिए शुक्रिया, हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं, हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए हमारी आर्थिक मदद करें