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जब विश्‍वगुरू को अंग्रेज़ों ने सिखाया, विज्ञान और समाजिकता

कल क्रिस्टोफर हिचन्स की विदाई तिथि गुजरी है। रेशनल और वैज्ञानिक सोच का झंडा बुलंद करने के लिए उनका संघर्ष यादगार रहा है।

दुर्भाग्य से भारतीय समाज में ऐसे लोग बहुत कम हुए हैं और हुए भी हैं तो उनका आम जन से रिश्ता ही नहीं बनने दिया गया है। भारतीय समाज इतना अंधविश्वासी, कुपढ़ और आत्मघाती है कि उसे बुद्धि ज्ञान और नयेपन से डर लगता है। पुराने अंधविश्वासों और कर्मकांडों की खोल में सिमटे रहना और भविष्य को अतीत की राख में दबाते रहना भारत की विशेषता है।

इस मुल्क में परसाई जैसे आलोचक, दाभोलकर जैसे रेशनलिस्ट या प्राचीन चार्वाकों जैसे तार्किकों नास्तिकों की परंपरा ही नहीं बन पाती। हर पीढ़ी में आसाराम, निर्मल बाबा और ओशो जैसे पोंगा पंडित खड़े हो जाते हैं और बुद्ध,चार्वाक, लोकायतों की क्रांति पर मिट्टी डालकर चले जाते हैं। यूरोप इस मामले में भाग्यशाली रहा है।

वहां आरम्भ से ही भौतिकवादियों और नास्तिकों तार्किकों की लंबी और समृद्ध परम्परा रही हैं। उसी के परिणाम में वहां पुनर्जागरण और विज्ञानवाद सहित आधुनिकता आई है जिसका लाभ भारत भी लेता है लेकिन उसे स्वीकार करने में झिझकता है। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, शासन प्रशासन, लोकतंत्र, सभ्यता, भाषा भूषा और नैतिकता सब यूरोप ने भारत को सिखाई है। उसके बिना ये मुल्क एक मिनट खड़ा नहीं रह सकता लेकिन इसके बावजूद इतना नैतिक साहस नहीं कि इन तथ्यों को स्वीकार कर लें।

इसे स्वीकार करना तो दूर उल्टा इन विज्ञानं, तकनीक का इस्तेमाल करके इसी विज्ञानं और सभ्यता का विरोध किया जाता है। बच्चों को जिस चिकित्सा, शिक्षा और सुविधा की सुरक्षा में पैदा किया जाता है और पाला जाता है उसका विरोध करते हुये इन्हीं बच्चों को विज्ञानं के विरुद्ध खड़ा किया जाता है। बचपन से ही पूजा पाठ यज्ञ कथाएं उनके दिमाग में ठूंस दी जाती हैं। ये सामूहिक आत्मघात है। इसीलिये एशियाई समाज कुछ भी मौलिक नहीं खोज पाते। वे यूरोप के आज्ञापालक ही बने रहते हैं।

यूरोप का बुद्धिजीवी वर्ग बहुत पहले ही बाबाओं, गुरुओं और धार्मिक प्रवचनों के घनचक्कर से आजाद हो चूका है। आम जन में थोड़ी सी धर्मभीरुता बची है लेकिन वह उतनी बड़ी और जहरीली नहीं जैसी भारत में है। यहां तो उलटी गंगा बहती है। यहां का तथाकथित क्रन्तिकारी और प्रगतिशील वर्ग सबसे ज्यादा अंधविश्वासी और धर्मभीरु है। दर्शन, काव्य या हिंदी साहित्य उठाकर देखिये मनु, शक्तिपूजा, महाभारत रामायण के बिंब और मिथकों की गप्पों पर खड़े कथानक पिछली सदी के आधे हिस्से तक मुख्यधारा के साहित्य पर छाये रहे। 1935 तक साहित्य में नायिका विमर्श और नख शिख वर्णन देख लीजिए। लगता ही नहीं कि ये भारत में जन्म लिए पले बढ़े लोगों का साहित्य है। इस साहित्य में देवी देवता, राजे महाराजे, अवतार इत्यादि भरे हुए हैं। आम आदमी, मजदूर किसान या स्त्री का कोई जिक्र ही नहीं।

अंग्रेजों के सत्संग में जब यूरोपीय साहित्य, सभ्यता, संस्कृति और दर्शन का दरवाजा भारतीयों के लिए खुला तब राममोहन, केशब, विवेकानन्द जैसों को बड़ी शर्म महसूस हुई कि भारत कैसा समाज है? इसी के परिणाम में सती प्रथा उन्मूलन जैसी सामाजिक सुधार हुए, ईसाई धर्म की सेवा भावना सीखकर धार्मिक सुधार किये गए।

इसके बहुत बाद रवीन्द्रनाथ और प्रेमचन्द जैसे शूद्रों/ पिछड़ी जाति के लेखकों का साहित्य देखिये वे ब्राह्मणवाद और अंधविश्वासी शिल्प सौंदर्य को साहित्य और सौन्दर्यशास्त्र के मैदान में आकर ललकार रहे हैं। यूरोप के इसी ज्ञान का बीज फूले, गांधी और अंबेडकर की बुलन्द आवाज में भी पल्लवित हो रहा है। और आज जो कुछ भी थोड़ा सुधार हम देख रहे हैं उसका स्त्रोत सीधे सीधे यूरोप के पुनर्जागरण और सामाजिक क्रांति के दर्शन में है।

इस बीच भारतीय पोंगा पंडित क्या कर रहे थे? उन्होंने इस बदलाव पर मिट्टि डालने के लिए धर्म राजनीती और कॉरपोरेट की ज़हरीली त्रिमूर्ति खड़ी की। नई नई कथाएं, पुराण, मिथक, झूठ और अफवाहें खड़ी की। सांप्रदायिक दंगे और मंदिर मस्जिद के बेकार के मुद्दों को राजनीति की धुरी बना दिया। ध्यान, समाधि, अध्यात्म और पूरब पश्चिम के संश्लेषण के नाम पर धर्म और अन्धविश्वास की अफीम को फिर से राष्ट्रवाद और देशप्रेम के साथ घोल दिया। नतीजा सामने है। पूरा मुल्क बैंको की कतारों में लगा चिल्लर गिन रहा है।

क्या यह अवश्यम्भावी था? ये रोका नहीं जा सकता था? क्या भविष्य को बदला जा सकता है?

जरूर बदला जा सकता है। हमारी स्त्रियां और बच्चे अगर इन धार्मिक, बाबाओं, योगियों, कथाकारों की बकवासों से बच सकें या बचाई जा सकें तो हम भी अगली दो पीढ़ियों में भारत में सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र और नैतिकता सहित विज्ञान भी पैदा कर सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य ये कि इन नवाचारों की हत्या करने वाले बाबा, योगी और ओशो रजनीश जैसे रजिस्टर्ड भगवान इतने धूर्त और होशियार हो गए हैं कि वे क्रान्ति के नाम पर ही अन्धविश्वास सिखाने लगते हैं। जहर को दवाई बनाकर पिलाने लगते हैं। और ये अभागा मुल्क उनकी जहरीली खुराकों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने लगता है।

क्या भारतीय समाज नीत्शे, रसल, मार्क्स, कोपरनिकस, गेलिलियो, ह्यूम, डार्विन, आइंस्टीन, डॉकिन्स और हिचिन्स पैदा कर सकता है? या कम से कम निर्मल बाबा और ओशो जैसे पोंगा पंडितों को बीच से हटाकर इन तार्किकों को अपनी अगली पीढ़ियों के प्रति उपलब्ध करवा सकता है? इसी प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करेगा कि भारत सभ्य होगा या नहीं होगा।