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भारत में “फेमिनिज़्म” की परिपूर्णता एक मिथक है

नारीवाद की अवधारणा भारत में केवल सवर्ण महिलाओं का फैशन है क्योंकि यहाँ फेमिनिज़्म पितृसत्ता का बुलेटप्रूफ़ जैकेट और ब्राह्मणवाद का हथियार है।

दरअसल स्त्री अधिकारों और समानता की मुनादी करने वाले सवर्ण नारीवादी लोग ब्राह्मणवादी सिस्टम की कठपुतलियाँ हैं, जिन्हें जातीय प्रिविलेज की रक्षा करने के लिए नारीवाद के नाम का झुनझुना पकड़वाया गया है। भारत में नारीवाद का पूरा डिस्कोर्स इस बात पर टिका हुआ कि वे जातिगत प्रिविलेज को बनाये रखने और उसे संरक्षित रखने में कितना सहयोग कर रहा है। इस रूप में यहाँ नारीवाद का पर्याय केवल सवर्ण नारीवाद और छद्म जातिवाद है।

सवर्ण महिलाओं का आंदोलन झूठा नारीवाद है, क्योंकि इसका नेतृत्व भी उनके हाथ में नहीं, बल्कि सवर्ण पुरुषों के हाथ में है। सवर्ण फेमिनिस्ट बहुजन महिलाओं के आंदोलन को सवर्ण पुरुषों के बचाव में आगे नहीं बढ़ने देती या विक्टिम ब्लेमिंग-नेमिंग-शेमिंग करने लगती हैं।

जातिगत श्रेष्ठताबोध सब बातों पर भारी

ब्राह्मण/सवर्ण पुरुषों के हाथों की कठपुतली बने हुए नारीवादी आंदोलन में बहुजन महिलाएँ अपनी जाति के कारण शामिल नहीं की जाती। सवर्ण महिला में महिला नहीं होती बल्कि केवल सवर्ण होती है, इसलिए जातिगत श्रेष्ठताबोध उन्हें केवल ब्राह्मणवाद का हथियार बनाये रखता है। इसलिए जैसे ही बहुजन महिलाओं के मुद्दे सामने आते हैं, नारीवादी बगले झाँकने लगते हैं।

हाल ही में इसका एक बड़ा उदाहरण देखने में तब आया जब राया सरकार ने शिक्षा जगत से जुड़े यौन कुंठित 69 प्रोफ़ेसर्स की सूची जारी की , जिन्होंने अपनी छात्राओं का यौन शोषण किया था। राया की सूची में सम्मिलित लगभग सभी प्रोफ़ेसर्स ब्राह्मण/सवर्ण, लेफ़्टिस्ट (इक्का-दुक्का ) थे, जिन्हें पीड़ित छात्राओं के बयानों पर जारी किया गया था।

आरोपियों के समर्थन सवर्ण होने का फर्ज निभाना है

सूची जारी करते ही सो कॉल्ड फेमिनिस्ट कविता कृष्णन, निवेदिता मेनन और आयशा किदवई (जो सभी सवर्ण हैं) ने बाकयदा बयान देकर राया और सभी पीड़िताओं की आलोचना की। चूंकि लगभग सभी शोषक प्रोफ़ेसर्स ब्राह्मण/सवर्ण थे, ज़ाहिर तौर पर सभी फेमिनिस्टों ने अपने सवर्ण होने का फर्ज निभाया।

एक अम्बेडक्राइट लड़की नारीवाद का नेतृत्व करे, यह सवर्ण फेमिनिस्टों को बर्दाश्त कैसे हो सकता था। आख़िर क्यों सवर्ण नारीवादियों को उन प्रोफ़ेसर्स के बचाव में आना पड़ा?

जवाब साफ है, नारीवादियों का नारीवाद दरअसल ब्राह्मणवादी व्यवस्था से अलग नहीं है।

हमारे देश में जाति का मुद्दा सभी मुद्दों पर भारी पड़ता है, और नारीवाद भी उससे अछूता नहीं है। जो स्टेप बहुजन छात्रा राया सरकार ने लिया, यही कदम किसी सवर्ण लड़की ने ऊठाया होता तो क्रांतिवीर, नेशनल हीरोइन, बहादुर लड़की, क्रान्तिलीक आदि तमगों से नवाज़ दी जाती। सोशल मीडिया पर नेशनल फेस बन जाती, नारीवाद का झंडा उसके हाथों में थमा दिया जाता और पूरा मीडिया उन्हें क्रांति कहकर प्रचारित करता।

बहुजन लड़कियों को सवर्ण औरतों के समान स्पेस नहीं मिलते। अब जबकि बहुजन लड़कियों ने अपनी लड़ाई खुद लड़ना, बोलना-लिखना शुरू कर दिया है, तो सवर्ण फेमिनिस्टों को अपना आंदोलन जो कि बस हवाबाज़ी है टूटता नज़र आ रहा है।

प्रोफेसर्स की सूची से तकलीफ का सबब जनेऊ का पवित्र धागा है

इसलिए उन्हें बड़े-बड़े बयान देकर अपने पतियों, भाइयों, बॉयफ्रेंड्स की रक्षा करनी पड़ रही है। पितृसत्ता को गरिया कर अपना चेहरा चमकाने वाली फेमिनिस्ट अंततः पितृसत्ता के शरणागत ही हैं। राया सरकार की सूची से तकलीफ का सबब जनेऊ के पवित्र धागे का ही है। ड्यू प्रोसेस फ़ॉलो करने की सलाह देने वाली सवर्ण औरतें ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि ड्यू प्रोसेस का मतलब ब्रह्मानिकल सिस्टम में खुद को ख़त्म कर देना है जहाँ जाति देखकर न्याय मिलेगा।

जाति के आधार पर ही महिला मुद्दों का समर्थन या विरोध होना है तो उसे नारीवाद का नाम क्यों दिया जाए?

यह वही नारीवाद है जहाँ सवर्ण महिलाओं के साथ होने वाला शोषण राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया जाता है और दलित-बहुजन महिलाओं के साथ कुछ भी हो जाए तो उस पर उफ़्फ़ भी नहीं निकलती। ये नारीवाद पितृसत्ता का पोषण करने वाला है, जो केवल ब्रह्मानिकल सिस्टम का सबपार्ट है। जब जाति के आधार पर ही महिला मुद्दों का समर्थन या विरोध होना है तो उसे नारीवाद का नाम क्यों दिया जाए? जहाँ वंचित वर्ग की महिलाओं की आवाज़ की इम्पोर्टेंस न हो ऐसे फेमिनिज़्म को एक मिथक ही कहा जाना चाहिए।

 

(लेखिका- दीपाली तायड़े)

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