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आखिर क्यों नेहरू के पीछे पड़ा है आरएसएस ?

 

ये देश का मन्तव्य नहीं कि भाजपा संघ की राजनीति करे। यदि संघ को अपनी क्षमताओं पर भरोसा होता तो खुद ही चुनाव न लड़ लेता। इसीलिए भाजपा मुखोटा है संघ का, जनता को विकास, भ्रष्टाचार कह कर गाय, मन्दिर मस्जिद, पकड़ा दिए।

ये 70 साल का रोना क्या है ?

संघी चाहते थे कि सबको मताधिकार नहीं होना चाहिए, मत का अधिकार सिर्फ चुनींदा वर्गों को होना चाहिए। उस वक्त के नेतृत्व ने (नेहरू,अम्बेडकर) तय किया कि ये मताधिकार दलितों, मुसलमानों और महिलाओं,गरीबों को समान रूप से मिलेगा। संघियों में ग्रंथि घर कर गयी। 1925 का बना हुआ संघ 1945 के आते आते एक आवाज़ रखता था, निर्णयात्मक तो नहीं थी,पर वौइस् थी। और आज जब निर्णयात्मक स्तर पर है तो वही किया जा रहा है जो सोच उस वक्त फलीभूत नहीं हुई।

संघियों ने कहा वर्तमान संविधान का प्रारूप मनुस्मृति के कानून को समाहित नहीं करता, इसमें भारतीय संस्कृति की झलक नहीं है। डॉ आंबेडकर और नेहरू ने कहा संविधान सम्पूर्ण विश्व के बेहतरीन कानूनों से प्रेरित होगा,किसी की भी कुंठा से नहीं।

संघियों ने मांग की देश को हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए। नेहरू और डॉ आंबेडकर ने एक स्वर में कहा भारत का स्वरूप बहुभाषी और बहुधार्मिक है इसे किसी एक रंग में नहीं रंगा जा सकता देश का प्राण बहुसांस्कृतिक है इसे आप धर्मनिरपेक्षता भी कह सकते हो।

संघी चाहते थे देश में एकात्मक शासन हो नेहरू और डॉ आंबेडकर ने व्यवस्था दी कि भारत विविधताओं वाला देश है, प्रत्येक क्षेत्र की अपनी सुखद विविधताएं हैं, जिन्हें बनाये रखने का उस क्षेत्र के लोगों को नैसर्गिक अधिकार है, इसलिए संघात्मक व्यवस्था होगी।

संघियों ने जोर देकर कहा कि किसी भी वर्ग के लिए विशेष प्रोत्साहन या लक्षित योजना नहीं होनी चाहिए, जैसे आरक्षण। डॉ आंबेडकर और नेहरू ने कहा कि देश का वंचित समुदाय मुख्यधारा में तब तक नहीं आएगा जब तक इन्हें विशेष सुविधाएं न दी जाएं।

संघी चाहते थे देश की समस्याओं का समाधान ज्योतिष और यज्ञों के माध्यम से हो, भारत को पाश्चात्य विशेषकर ईसाई चिकित्सा पद्धति का प्रयोग नही करना चाहिए, आयुर्वेद में हर रोग का उपचार है। नेहरू ने कहा देश का युवा आधुनिक चिकित्सा पद्धति का ज्ञान भी रखेगा और आयुर्वेद भी पड़ेगा। आधुनिक ज्ञान धर्म के आधार पर त्याज्य नहीं हो सकता।

 

संघी मानसिकता मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा ढाए गए जुल्म का बदला वर्तमान भारतीय मुस्लिमों से लेना चाहती है। इसलिए न तो संघी स्वतंत्रता आंदोलन में इनकी भूमिका चाहते थे न ही राष्ट्र निर्माण में इनके योगदान को स्वीकार करते हैं। इसके विपरीत धर्म निरपेक्ष सोच ने ये माना कि भारतीय मुसलमान पूर्ण रूप से भारतीय है और उसे किसी भी सनक के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।

संघी इस मत पर अडिग थे कि शिक्षा की गुरुकुल पद्धत्ति सर्वश्रेष्ठ है वेद ज्ञान के एक मात्र स्रोत हैं। पाठ्यक्रम में गीता,महाभारत और रामायण अनिवार्य रूप से होने चाहिए, ज्योतिष के बिना भारतीय पाठ्यक्रम अधूरा है। नेहरू ने व्यवस्था की रीसर्च के लिए टीआईएफआर, अंतरिक्ष विज्ञान के लिए इसरो और चिकित्सा के लिए आई आई एम की व्यवस्था हो।

यही और ऐसा ही बहुत कुछ इस संघी मानसिकता के लोगों को ये कहने का आधार देता है कि देश में पिछले 70 वर्ष में कुछ नहीं हुआ,देश को कांग्रेस ने बर्बाद कर दिया। और आज जब केंद्र सरकार ,राजस्थान सरकार,उत्तर प्रदेश सरकार शिक्षा के बजट में कटौती होती है तो इस मानसिकता को संतुष्टि होती है। क्योंकि ये मानते है कि सबको शिक्षा के विचार ने मजदूरों को उनके सर पर बिठा दिया।

जब मध्य प्रदेश सरकार ज्योतिषों को सरकारी हस्पतालों में बिठाने का आदेश देती है तो ये मानसिकता इसे भारतीय संस्क्रुति की स्थापना समझती है। जब मोदी जी चुन चुन कर सरकारी क्षेत्रों को बेचते हैं तो ये मानसिकता आश्वस्त होती है की आरक्षण ऐसे ही खत्म हो सकता है। जब जगह जगह मुसलमानों को मारा जाता है दलितों को टारगेट किया जाता है महिलाओं को चूल्हा चाकी तक सीमित बताया जाता है तो इस मानसिकता को अपार मानसिक शांति मिलती है। जब मोदी योजना आयोग को खत्म करते हैं और उसे नीति आयोग कहते हैं तो यही संघी मानसिकता संतुष्ट हो जाती है क्योंकि नेहरू अम्बेडकर के विरोध का ये एक माध्यम नजर आता है।

 

अब ये लोग खुलकर डॉ आंबेडकर का विरोध तो दलित/पिछड़ा वोट की वजह से कर नहीं सकते, इसलिए अपनी सारी कुंठा नेहरू पर निकालते हैं। पहले तो नेहरू को मुस्लिम सिद्ध करते हैं, फिर उनके चरित्र को दागदार करते हैं। और अंत में जब नेहरू के साइंटिफिक टेम्पर, योजना आयोग ( अंबेडकर विचार), औद्योगीकरण, आईआईएम, टीआईएफआर, इसरो का कोई तोड़ नहीं ढूढ पाते तो कश्मीर और चीन समस्या का जिम्मेदार बनाने का षड्यंत्र रचते हैं।

वास्तव में ये लड़ाई दो विचारों की है देश को ये तय करना है कि वे किस विचार के साथ हैं। और ये भी की तटस्थता का कभी इतिहास नही लिखा जाता, इस वक्त देश को सबसे ज्यादा खतरा इसी तटस्थता से है।

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