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आज के दिन जन्म हुआ था दिल ऐ बेकरार का अफसाना लिखने वाली उमा देवी उर्फ़ टुनटुन का

टुनटुन के नाम से शायद ही कोई नावाकिफ हो। टुनटुन को भारतीय फिल्म सिनेमा के पहले कॉमेडियन के नाम से जाना जाता है। फिल्मों में अपनी हँसोड़ भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध नायिका टुनटुन का असली नाम उमा देवी था।  आज के ही दिन 1923 में उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में जन्मी उमा देवी की बॉलीवुड में बतौर हास्य कलाकार के रूप में स्थापित होने की कहानी एक हौंसले की कहानी है।
माँ बाप के बचपन में गुजरने के बाद उमा देवी अपने बड़े भाई  चाचा जी के साथ रही।  उमा की एक सहेली दिल्ली से अपने गांव  वापिस आयी।  सहेली के मुंबई में बहुत से लोगो से जान पहचान थी।  बस सहेली के सिफारिशी खत के साथ 23  साल की उम्र में उमा देवी खत्री मुंबई आ गयी। मुंबई में उनकी मुलाकात हुई अभिनेता और निर्देशक  अरुण आहूजा और गायिका निर्मला देवी से ।  अरुण आहूजा और  निर्मला देवी गोविंदा के माँ बाप थे। इस दम्पति ने बहुत से लोगो से मिलाया और उमा देवी एक दिन नौशाद साहब के घर पहुँच गयी। उनके घर पर धरना दे दिया कि या तो गाना गाने का मौका दीजिये नहीं तो अभी जाते है समंदर में। नौशाद साहब ने उनका ऑडिशन लिया और उसी वक्त उन्हें साइन कर लिया। 1947 में उमा देवी का गाना आया
अफसाना लिख रही दिल ऐ बेक़रार का
आँखों में रंग भर के तेरे इन्तजार का।
दर्द फिल्म के इस गाने ने धूम मचा दी। जल्द ही उमा देवी सबसे ज्यादा पैसे पाने वाली प्लेबैक गायिकाओं की पंक्ति में आ खड़ी हुई। पर गायिकी में उनका कॅरियर ज्यादा लम्बा न चल सका। लता मंगेशकर और आशा भोंसले के साथ प्रतियोगी होना का खामियाजा उन्हें  भुगतना पड़ा।
 प्लेबैक में हाथ आज़माने के बाद अब बारी अभिनय की थी।  नौशाद साहब ने उन्हें अभिनय करने की सलाह दी। उमा देवी  हंसमुख स्वभाव और कॉमिक टाइमिंग की वजह से नौशाद जी को लगता था उमा देवी कमाल की कॉमेडियन साबित होंगी और नौशाद साहब ग़लत साबित नहीं हुए। उमा देवी को भी बात पसंद आयी पर उन्होंने कहा वो दिलीप कुमार के साथ काम करना चाहती है। जी भर के हंसने के बाद नौशाद साहब ने दिलीप कुमार जी से बात की और 1950 में बाबुल में उन्हें पहली बार अभिनय का मौका मिल गया जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा बाबुल में ही उन्हें स्क्रीन नेम टुनटुन मिला। 1950 से लेकर 1990 तक उन्होंने अनगिनत फिल्मों में काम किया और दर्शकों के मन में एक स्थायी जगह बनाने में कामयाब रही।
23 नवम्बर 2003 में उमा देवी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।


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