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सामाजिक समरसता क्यों सामाजिक समानता क्यों नहीं?

संतोष पटेल –

दलितों की खुशियाँ उनके जान की दुश्मन बन जाती हैं। शादियों में डोली या घोड़ी पर बैठना समाज के तथाकथित उच्च वर्ग के कुछ लोगों को पसंद नही है। यदि किसी दलित ने कुर्सी पर बैठ कर खा लिया तो उसकी पीट-पीट कर हत्या की जा सकती है, मानो कुछ सवर्णों का यह मौलिक अधिकार हो। नवविवाहिता दलित जोड़े शादी की तैयारी हेतु बाज़ार जा रहे हो तो उनका बलात्कार कर दिया जाता है। ऐसी घटनाएं अभी भी समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव, पाशविक वृति और दरिंदगी की ओर इशारा कर रहे हैं।

मैं तीन उदाहरण दे रहा हूं जो अप्रैल- मई, 2019 में भारत के विभिन्न राज्यों में घटित हुई हैं।

पहली घटना, अप्रैल 2019, उत्तराखंड में। टिहरी गढ़वाल , श्रीकोट गाँव, नैनबाग में दलित युवा, जितेंद्रदास की हत्या से जुड़ी है। उसकी गलती केवल यह थी कि कि वह एक शादी समारोह में कुर्सी पर बैठकर खा रहा था, जो वहां के कुछ सवर्णों को नागवार गुजरा। उन्होनें जितेंद्रदास की थाली उलट दी और फिर कुर्सी से नीचे गिरा कर लात घूंसों से पीटना शुरू कर दिया और तब तक पिटते रहे जबतक वह अचेत ना हो गया। अंततः जितेंद्र दास सामंती घृणा और जातीय भेदभाव का शिकार हो गया, और अस्पताल ने उसे मृत घोषित कर दिया।

जितेंद्रदास की नृशंस हत्या ने 39 साल पहले यानी 1980 में उत्तराखंड ( तब के उत्तर प्रदेश) के अल्मोड़ा में घटित ‘कफ़ल्टा कांड’ की याद ताजा कर दी, जिसमें श्याम प्रसाद नामक दलित की शादी थी। डोली में बैठकर बारात में आई थी। नतीजा, समांतियों ने 14 दलितों की क्रूरतापूर्ण हत्या कर दी। जिसमें 6 दलितों बारातियों को जिंदा जलाया गया और 8 दलित बारातियों को पत्थर, लाठी और डंडों से मार मार कर जान से मार दिया गया। इस पाशविक वृति को क्या कहेंगे?

दूसरी घटना राजस्थान के अलवर के थानागजी की है जहां 18 साल की एक नवविवाहिता दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। पहले तो प्रशासन लीपापोती करती रही। इस घटना को अंजाम देने वाले सामन्तियों का घिनौनापन देखिये कि एक तो उस युवती का बलात्कार उसके पति के सामने कर रहे थे और दूसरे अमानवता का आलम देखें कि अपने कुकृत्यों का वीडियो भी बना रहे थे, जिसे बाद में वायरल कर दिया। देखा जाए तो ये दलित नव दम्पति भी शादी समारोह के लिए नजदीक के बाज़ार में खरीददारी करने जा रहे थे। इस सामंती मनोवृति से समरसता आएगी?

तीसरी घटना के रूप में अमानवीयता का एक मिशाल देखने को मिली गुजरात के मेहसाणा में, जहाँ वीनू ठाकोर नामक सरपंच ने एक दलित परिवार को फरमान जारी किया कि दूल्हा शादी में घोड़ी नहीं चढ़ सकता । जिसका प्रतिरोध उस दलित परिवार ने किया। नतीजतन, उस दलित परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।

अब देखिए इस घृणा, द्वेष, सामंती प्रवृति, जातीय भेदभाव, असमानता और पाशविक आचरण के बावजूद लोग सामाजिक समरसता की बात करते हैं। ‘मनुवाद और उसकी अवधारणा’ में चिन्तक एल बी पटेल लिखते हैं – ‘प्रकृति ने जब अब इंसानों को स्वभाव से समान बनाया है और उसके सभी इंसानों पर एक ही नियम भी लागू होते हैं, तो फिर मानव मानव के बीच असमानता बनाए रखना या मानना कहाँ तक न्यायसंगत हैं?’ इंसान इंसान के बीच गुणों-अवगुणों, रूप-रंग, और क्षमताओं का अंतर होता है, किंतु इससे मानव मात्र की बुनियादी समानता पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

भारतीय संविधान सबको समान मानकर सबको एक समान जीवन जीने का अधिकार देता है। आरएसएस और बहुजन चिंतन में कंवल भारती लिखते है- समरसता क्या है? जन संघी चिन्तक दीनदयाल उपाध्याय ने एक राजनीतिक दर्शन दिया- एकात्म मानववाद। यह दर्शन असमानता की विचारधारा को मानता है। एकात्म मानववाद में समरसता का मतलब है कि जिस तरह हाथ की पांचों उंगलियां समान नहीं हैं, पर उनके बीच एक समरसता होती है। उसी तरह हिन्दू समाज में सभी जातियाँ समान नहीं होती हैं, परन्तु वे सब जातियाँ जिस तरह एक- दूसरे के साथ कर्त्तव्य-भावना से जुड़ी हुई हैं। जैसे किसी का का पढ़ने- लिखने का है, किसी का रण में युद्ध करने का है, किसी का व्यापार करने का है और किसी का सेवा करने का है; उसी का नाम समरसता है। परोक्ष रूप से यह वर्ण व्यवस्था का दूसरा नाम है।

उपरोक्त तीनों उदाहरण असमानता से उपजे हैं, जातीय भेदभाव के परिणाम हैं। जो समरसता से( harmony) नहीं वरन समानता (equality) से ही सम्भव है। समानता से ही जातीय भेदभाव खत्म हो सकेगा और मानवता स्थापित हो सकेगी, तभी समरसता यानी हार्मोनी आ सकती है।

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