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क्या आप भी जातीय भेदभाव का शिकार हुए हैं? मध्य‍मार्ग से शेयर करें अपने अनुभव- एक अपील

#WeTooHuman

भारतीय समाज में फैली छुआछूत जैसी जहरीली बीमारी के कुछ व्यक्तिगत अनुभव-

  • पैसों की दिक्कत के चलते मुझे छठवीं कक्षा से सरकारी स्कूल में डाल दिया गया। पहले ही दिन अछूत बच्चों को उनका काला रंग देखकर अलग से खड़ा किया गया। हमें बताया गया कि हमें बारी-बारी से क्लास में झाड़ू लगाना और टॉयलेट्स साफ करना है। पहली बार अपने कपड़े संभालते हुए स्कूल के बदबूदार टॉयलेट में मग्गे से पानी डालकर झाड़ू फेरते हुए अपने अछूत होने की तकलीफ को झेलते हुए खुद पर बहुत शर्म आई। मैं बहुत रो रही थी पर मेरे आँसू से किसे फ़र्क पड़ता क्योंकि मैं एक अछूत लड़की हूँ- दिपाली तायड़े
  • एम.ए., एम.फिल. एवं पी-एच.डी. में प्रवेश के लिए आयोजित इंटरव्यू बोर्ड का सदस्य होने के नाते मैंने कई बार देखा कि सामान्य श्रेणी से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों को जान-बूझकर कम अंक दिए जाते थे, ताकि वे सामान्य श्रेणी में न आ जाएं- प्रो. सुनील कुमार सुमन
  • एक मित्र ने बताया की खुलेआम अस्पृशयता का उदाहरण उन्हें राजस्थान के एक गाँव के मीणा समाज की एक शादी में देखने को मिला। भंगी-चमार समुदाय के लोगों को अलग से बिठाया गया था। जहाँ बगल से गन्दा पानी बह रहा था। उन्हें खाना भी ऊपर से गिरा कर दिया जा रहा था और खाने के बाद उनके पत्तल भी उन्हें खुद ही उठा के फेंकना था बल्कि बाकी लोगों के साथ ऐसा नहीं किया जा रहा था- मृणाल श्रेष्ठ
  • सिर्फ 2 से 3 साल पहले ही गांव में बिजलीआई है। लंबे समय तक गांव में सिर्फ एक ही टीवी था जो सौलर पैनल और बैटरी से काम करता था। यह एक टीवी एक सुंडी परिवार के घर में था, जहाँ उनकी गली से गुजरते हुए हम लोग केवल उनके बरामदे तक ही जा सकते थे। जान-बूझकर वे पहले कमरे में टीवी को रखते थे, केवल सुंडी, प्रधान, पानीगराही बच्चों ही अंदर जा सकते थे। हम खिड़की में छोटे से छेद में से झांककर देखने के लिए हम लोग कड़ी मेहनत करते थे। उनका बरामदा सड़क के नजदीक था। हर बार जब उन्हें इस बात का एहसास होता कि हम गली से गुजरते हुए एक पल भी रुकते हैं तो वे आते और हमें छड़ी लेकर दूर तक हमारा पीछा करते- सुमीत समोस
  • मैंने अपनी जात कभी नहीं छिपाई, जब भी कोई पूछता तो बता देती थी। लेकिन बहुत बार ऐसा हुआ जब मुझे अपनी जाति बताने में बहुत ही शर्मिंदगी महसूस हुई। हर रोज जाति के नाम पर ज़लील किया जाता था। लेकिन एक बात जो हर रोज होती थी, हमारे घर में हैंडपैंप था और जो भी सवर्ण और ओबीसी हमारे घर पानी लेने आते थे वो हैंडपैंप और पूरी जगह को धोते थे और अछूत जाति के लोगों से बचते थे। और अगर गलती से किसी का मटका छू जाता तो उसे घर जाकर फोड़ दिया जाता था- रीतु सिंह

भारत के हर गाॅँव, हर कस्‍बे में लोग एक-दूसरे को अच्‍छे से जानते हैं। चूंकि हर कोई हर किसी से परिचित होता है तो सबको आपस में जाति पता होती है। जाति के आधार पर सबका एक काम निर्धारित होता है, फिर इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि कोई चमार, चमार का पेशा करता है या नहीं, कोई कुम्‍हार, कुम्‍हार का पेशा करता है या नहीं। पैदा होने से पहले भारत में बच्चे की जाति निर्धारित हो जाती है।

भारत में पैदा हुए हर व्‍यक्ति की एक जाति है और जाति का निर्धारण होता है आपके जन्‍म के आधार पर। भारत में आप सब कुछ बदल सकते हैं लेकिन जाति नहीं। आप कहीं चले जाईए अपनी जाति से नहीं भाग सकते।

भारत में आप जहॉं भी जाते हैं आपकी जाति आपके साथ जाती है। लोगों का पहला सवाल ही यही होता है “किस जाति से हो ?’’ और ये एक ऐसा सवाल है जिस से आप भाग नहीं सकते। चूंकि हर व्‍यक्ति की एक जाति निर्धारित है और सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार आपको अपनी जाति हर बार पूछने पर, बताना जरूरी है।

जाति ना बताने पर या इस सवाल से बचने पर भी आप संदिग्‍ध हो जाते हैं कि निश्चित ही आप जाति इसीलिए छुपा रहे हैं कि आप ‘नीच जाति’ से हैं। क्‍योकि ऊँची जाति में जन्‍म लेना तो गर्व का विषय है, ‘ऊँची जाति’ ही लोगों के लिए गर्व का विषय है।

यदि आप अपनी जाति छि‍पाते नहीं हैं तो भी स्‍कूल, कॉलेजस् और यूनिवर्सिटीज् में आपको जाति के आधार पर बेइज्‍जत किया जाएगा। तरह-तरह के डेरोगेटरी रिमार्कस् आपको पास किए जाएंगे। और कुछ केसेज में तो आपको तब तक प्रताड़ित किया जाएगा जब तक कि आप आत्‍महत्‍या करने पर विवश ना हो जाएँ। अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों के साथ भेदभाव और आत्‍महत्‍या की खबरें अक्‍सर आप भारतीय मीडिया में पढ़ सकते हैं।

भारत में आप चाहें या न चाहें, एक अछूत के रूप में आपकी पहचान एक ऐसी चीज है जिसे आप चाह कर भी नहीं बदल सकते।

आप भारत के किसी भी हिस्‍से में चले जाएँ, यूपी, बंगाल, पंजाब, केरल, महाराष्‍ट्र आप की जाति आपका कहीं पीछा नहीं छोड़ती।

जाति को लेकर हर अवर्ण व्‍यक्ति के कुछ ना कुछ बुरे अनुभव ज़रूर जुड़े होते हैं। हर अवर्ण या अछूत को इस कड़वी सच्‍चाई से गुजरना पड़ता है।

और सबसे ज्‍यादा अंचभित करने वाली बात यहै है कि लोग इस इतनी बड़ी अमानवीय व्‍यवस्‍था पर बात ही नहीं करना चाहते। भारतीय लोग इस जातीय व्‍यवस्‍था के साथ इतने सहज हो गए हैं कि अब उन्‍हें ये जातीय व्‍यवस्‍था अमानवीय ही नहीं लगती।

कुछ इसी तरह के अनुभवों को आप सभी के साथ साझा करने और बाहर लाने का एक प्रयास मध्‍यमार्ग कर रहा है। मध्‍यमार्ग का प्रयास है इस अमानवीय कुप्रथा से वो लोग भी परिचित हो सकें जो इस कुव्‍यवस्‍था को कोई समस्‍या ही नहीं मानते, और भारत में यह बीमारी कितनी गहरी जड़ें जमाकर बैठी है इस बात का एहसास सबको हो सके।

साथ-ही-साथ जिन लोगों ने छुआछूत और भेदभाव जैसी अमानवीय व्यवस्था को झेला है वो अपने अनुभव को बाकि लोगों से शेयर करके ये बता सकें कि कितनी बड़ी आबादी आज भी किसी न किसी स्‍तर पर जातिव्‍यवस्‍था की शिकार है।

तो आईये, #WeTooHuman कैम्‍पेन से जुड़िए और अपने अनुभव हैशटैग #MadhyaMarg और #WeTooHuman के साथ अपनी वॉल पर शेेयर कीजिए और लोगों को बताईये किस किस स्‍तर पर आज भी जिंदा है जातिवाद।

 

(टीम मध्यमार्ग)

 

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