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बाग़ी बनते नहीं बनाए जाते हैं

बाग़ी बनते नहीं बनाए जाते हैं
अन्याय के बीज़ से उपजाए जाते हैं
फूलन बाग़ी क्यों बनी?
ददुआ बाग़ी क्यों बना?
पान सिंह बाग़ी क्यों बना?

एक साधारण महिला थी
एक किसान था
एक धावक और सेना का जवान था

जब एक महिला का
सामूहिक बलात्कार किया जाएगा
गाँव में निर्वस्त्र घुमाया जाएगा
और मौन रहेगी व्यवस्था
तो अन्याय का प्रतिकार कैसे होगा ?
अन्याय पर प्रहार कैसे होगा?

जब ज़मीन किसान की
दबंग, छीन लेंगे
पाँव के नीचे से धरती खींच लेंगे
और थाने में जाने पर
न्याय व्यवस्ता का दरवाजा खटखटाने पर
सिर्फ मिलती हो निराशा
तो बाग़ी तो बनेंगे ही
निर्दोष, दागी तो बनेंगे ही

आज भी
माचिस की तीली न मिलने पर
दलित महिला को सवर्ण जला देता है
न्याय का तत्व पैसे की गठरी में बंधा होता है

ऐसे में, रगों में रक्त विद्रोह का जाए दौड़
तो आश्चर्य कैसा?
कोई फूलन, कोई ददुआ, कोई पान सिंह
बीहड़ में जाए पहुँच
तो आश्चर्य कैसा?

इन बीहड़ के निवासियों के लिए
न कोई सरकारी योजना होती है
न कोई पुनर्वास की परियोजना होती है
एक ही सरकारी संकल्प होता है
रखा गया एक ही विकल्प होता है
खामोश कर इन आवाज़ों को
शोषण को जारी रखना है
अन्याय को न्याय पर भारी करना है

क्या फ़र्क़ पड़ेगा
यदि एक दो बाग़ी बनते रहेंगे
कोई ददुआ, कोई फूलन
किसी पुलिस या किसी राणा के हाथ मरते रहेंगे
लेकिन
खाई तो बनी रहेगी
दहाई और ईकाई में तो ठनी रहेगी
और यथास्थिति बनाए रखा जाएगा
हमेशा हमेशा के लिए।

विक्रम जी के लेख से प्रेरित रचना ।लेख से यह भी पता चला कि 22 जुलाई को पुलिस मुठभेड़ में ददुआ को मारा गया था ।व्यवस्था में क्या कोई आमूल चूल परिवर्तन होगा कि कोई ददुआ,फूलन या पान सिंह तोमर न बने ।

 

(तेज प्रताप)

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