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जेएनयू चुनाव में बापसा की धूम, तेजी से उभर रहा बापसा

नई दिल्ली। जेएनयू एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिसको देशभर में प्रगतिशील माना जाता है। जेएनयू की चर्चा पूरे देश में होती है। जेएनयू से निकलने वाले छात्र नेता और अधिकारी बनते हैं।

जेएनयूएसयू चुनाव की चर्चा भी देशभर में होती है। जेएनयू की राजनीति पर नेता भी नजर रखते हैं। बड़े-बड़े नेता जेएनयू में बुलाए जाते हैं।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जेएनयूएसयू चुनाव 8 सितम्बर को होने जा रहै है। इस बार का चुनाब बेहद दिलचस्प होने वाला है।

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तेजी से उभर रहा है बापसा

काफी सालों से जेएनयू में लेफ्ट का कब्जा रहा है। लेकिन पिछले 2-3 तीन साल से अंबेडकरवादी छात्र संगठन बापसा यहाँ तेजी से उभर रहा है। कैम्पस राजनीति में बापसा काफी सक्रिय है।

बापसा (बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट एसोसिएशन) एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के छात्रों का संगठन है।

इस बार जेएनयूएसयू के लिए सेंट्रल पैनल में चार उम्मीदवार हैं। शबाना अली प्रेजिडेंट, सुबोध कुंवर वाइस प्रेजिडेंट, करम बिद्यानाथ खुमान जनरल सेक्रेटरी, विनोद कुमार ज्वाइंट सेक्रेटरी पद के उम्मीदवार हैं।

यूपी की शबाना अली और झारखंड के सुबोध कुंवर स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एसथेटिक्स के छात्र हैं। मणिपुर के करम बिद्यानाथ सेंटर फॉर पोलिटिकल स्टडीज और यूपी के विनोद कुमार स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन्स के छात्र हैं।

बापसा वंचित तबके के छात्रों का संगठन है। जो अपने हक- अधिकारों की बात कर रहा है। जो अपनी आवाज खुद उठाने की बात कर रहा है।

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2016 में आया था बापसा चर्चा में

BAPSA की स्थापना 15 नंवंबर 2014 को बिरसा मुंडा की जयंती पर हुई थी। यह संगठन छात्रों, एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक, कश्मीर, नॉर्थ-ईस्ट के छात्रों और एलजीबीटी के मुद्दों को जेएनयू कैम्पस में उठाता है।

जेएनयू के 2016 के प्रेजिडेंशियल चुनाव में बापसा के उम्मीदवार राहुल सोनपिम्पले 1545 वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे थे। जिसके बाद इस संगठन ने सबका ध्यान आकर्षित किया था।

इस बार के चुनाव पर सबकी नजर इसलिए भी है कि इस बार बापसा के छात्रों जोश में हैं। परिणाम चाहे कुछ भी हो लेकिन इस चुनाव की आने वाले समय की दिशा तय करने में खास भूमिका रहेगी।

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(टीम मध्यमार्ग)