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भारतीय क्रांति : रामलीला मैदान टू बेगूसराय वाया बनारस


भारतीय समाज के रूप में हम इतना मसखरी पसंद हैं कि हम या तो उस नेता को पसंद करते हैं जो मसखरी करे, या फिर हम जिसे नेता मानते हैं, अगर वो मसखरी न भी करता हो तो खुद हम उसकी बातों में मसखरी के तत्व ढूंढ लेते हैं। और न मिले तो कृत्रिम रूप से निर्मित कर लेते हैं। भारतीय समाज को अपने नेता में नौटंकी, चुटकुलेबाजी, सस्ते हथकंडे, बड़ी बड़ी अव्यवहारिक बातें आदि बेहद पसंद है।

भारतीय समाज के इस मनोविज्ञान को सबसे पहले और सबसे बेहतर लालू यादव ने समझा था। उन्होंने अपने भाषणों अपने लहजे में हास्य और हलके फुल्के मनोरंजन का पुट देते हुए समाज में एक राजनेता के तौर पर मजबूत पहचान बनाई।

लालू यादव के बाद भारतीय समाज की इस मानसिकता इस मसखरेपन के मनोविज्ञान को नरेंद्र मोदी ने समझा। और शायद उन्होंने इस मानसिकता का सबसे ज्यादा और कुशल दोहन भी किया। आप इसे सही गलत के पैमाने में जैसे आंकना चाहें आंक सकते हैं लेकिन यह तो स्वीकार ही करना पड़ेगा कि नरेंद्र मोदी से बेहतर इसके पहले किसी ने भारतीयों के मसखरेपन को इतना बेहतर और कुशलता से नहीं भुनाया। उन्होंने भाषण देने की अपनी मनोरंजक शैली से लाखों अंध-अनुयायी बनाए। उन्होंने समाज की कुंठित भावनाओं, ढोंग, दोहरेपन की ज़िंदगी को इतने बेहतर तरीके से समझा और अपने भाषणों में सब शामिल किया। उन्होंने झूठ भी ज़ोर से और कॉन्फिडेंस के साथ बोला।

उन्होंने अपने प्रतिद्वंदियों की खिल्ली उड़ाई ,तिरस्कार से भरी भाषा प्रयोग की ,अपमानजनक मुहावरे गढ़े। और यह सब सफल रहा, क्योंकि समाज के रूप में हम यही सब करते हैं या करना चाहते हैं। हम नरेंद्र मोदी के माध्यम से अपनी कुंठाओं और दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति होते हुए महसूस करने का सुख उठाते हैं।

दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने भारतीय समाज के एक खास तबके ‘शहरी मध्यवर्ग’ में निहित इस मसखरी के मनोविज्ञान को बखूबी समझा और उसे भुनाया भी। 
रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार विरोधी अपने अनशन से प्रसिद्द हुए अन्ना हजारे ने लोगों की ढोंग और झूठ से भारी जीवनशैली और सोच को पहले उकसाया, फिर अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली में इसका ज़मीनी प्रयोग किया और सफल रहे।

इस कड़ी में नया नाम है कन्हैया कुमार। लेकिन लालू से वाया मोदी ,अन्ना,केजरीवाल कन्हैया तक के सफर में एक बात बहुत साफ है कि कृत्रिमता और मीडिया का महत्व क्रमशः बढ़ता गया। जहाँ लालू बिना मीडिया और बिना कृत्रिम प्रचारतंत्र के समाज के मसखरेपन का दोहन करते हैं, वहीँ नरेंद्र मोदी और केजरीवाल प्रचारतंत्र और अपनी प्रतिभा के दम पर समाज के बड़े तबके को अपना फैन बना लेते हैं। और कन्हैया कुमार मूल रूप से समाज के इस मनोविज्ञान को उस गहराई से न समझते हैं न वैसा दोहन कर पाने की ऐसी कोई प्रतिभा अभी तक दिखा पाए हैं। मगर उनके पास मीडिया और प्रचारतंत्र का बड़ा हथियार है।

इसके साथ ही साथ लालू केजरीवाल और नरेंद्र मोदी के विपरीत कन्हैया भारतीय सत्ता तंत्र और मीडिया में फैले भयानक सवर्णवाद को पूरी तरह से तुष्ट करते हैं, वह भी प्रगतिशीलता के साथ। कन्हैया भारतीय समाज की इस मानसिकता का कैसे और कितना दोहन कर पाते हैं यह तो वक़्त बताएगा जो कि बहुत है उनके पास। अगर वे मसखरेपन में कुछ नए आयाम जोड़ सके और कुछ नया माल मनोरंजन के लिए समाज को उपलब्ध करा सके तो सफल राजनेता बनेंगे।

वही सोच जो लोगों को हज़ारों लाखों की संख्या में रामलीला मैदान पर जुटाती है, वही हज़ारों लाखों को किसी का अंध भक्त भी बनाती है। जो सोच साहित्यकारों और बौद्धिकों को 2014 में क्रांति की उम्मीद में दिल्ली से बनारस जाने वाली रेलगाड़ियों के टिकट कटाती है वही सोच थोड़े कम ज़्यादा लगभग उन्ही लोगों को 2019 में रेलों, कारों और हवाई जहाजों से दिल्ली से बेगूसराय का सफर करवाती है।

अगर वाकई हमें समाज को बदलना है तो यह बदलाव निश्चित ही ऊपर से नीचे नहीं आएगा। सामाजिक बदलाव हमेशा नीचे से ऊपर जाते हैं। देश में लोकतंत्र थोपे हुए लगभग सत्तर साल होने जा रहे हैं लेकिन लोकतान्त्रिक सोच समाज में नहीं पैदा की जा सकी। क्योंकि यह ऊपर से नीचे सफर नहीं तय करता। हमें समाज की सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ में लोकतांत्रिक मूल्य और सहज ईमानदार जीवन शैली स्थापित करने होंगे। और यह किसी नौटंकी मसखरी चालबाज़ी ढोंग से नहीं बल्कि ईमानदार कोशिशों से होगा। 

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