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बूसी बसिया से अभिभूत भारत की सहनशीलता

भारत हज़ारों वर्ष की गुलामी में रहा। कोई तो कारण रहा होगा, जो हमने हज़ारों वर्ष उफ तक नहीं की। कुछ छुट पुट आवाज़ों को छोड़कर,ऐसी आवाज़ें आज भी सुनाई देती हैं गौरी लंकेश जैसे लोगों के रूप में,पर इसके लिए मरना पड़ता है।

सहनशीलता के कुछ उदाहरण देखिए

वर्तमान सरकार ने कर आतंक की नई परिभाषा रचते हुए तीन वर्ष के शासन काल में ही सर्विस टैक्स 12.5% से बढ़ाकर 18 % कर दिया।

यू पी ए की सरकार के दौरान जब अंतराष्ट्रीय बाजार में क्रूड का दाम 132 डॉलर प्रति बैरल था। तब डीजल 62 और पेट्रोल 72 रु प्रति लीटर मिलता था। आज क्रूड 47 डॉलर प्रति बैरल है बावजूद इसके जनता बिना कुछ बोले पेट्रोल 72.50 और डीजल 63 रु लीटर खरीद रही है।

इस सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्सआइज़ डयूटी और कस्टम ड्यूटी के रूप में 10 रु प्रति लीटर तक बढ़ा दिए। ट्रेन किराए से लेकर प्लेटफार्म टिकट, कैंसलेशन से लेकर रिजर्वेशन तक के शुल्क में 50 % से लेकर 300 % की वृद्धि की गई।

सब्जियों के भी बढ़े दाम

मनमोहन जैसे कमजोर प्रधानमंत्री के वक्त देश का क्रेडिट ग्रोथ 13 % था। आज वही 5.1% है पर जनता खामोश ही बनी रही। एक एक करके लिब्रेटेड तरीके से कभी दालों के दाम 50 रु से 200 रु हुए, कभी सब्जियों के दाम 10 रु से 100 रु हुए।

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शिक्षा के क्षेत्र में स्कॉलरशिप में कटौती की

पर जनता इसे भी मोदी जी का चरणामृत समझ कर पी गई। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा के पाठ्यक्रमों से नेहरू, गाँधी के योगदान को हटाकर सावरकर को पढ़ाया जाने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में स्कॉलरशिप में कटौती की गई।

यू जी सी के बजट में 50 % की कमी की गईय। वर्तमान मानव संसाधन मंत्री जावड़ेकर जी ने प्रोफेसर्स को फ़्रॉड तक कह दिया, पर जनता ‘बूसी बसिया’ के मन की बात सुनने में ही मशगूल रही।

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बच्चे अस्पतालों में ऑक्सिजन की कमीं से मरते रहे

सरकारी योजनाओं पर शोध के लिए बाध्य किया गया, वेदों और उपनिषदों को शोध पाठ्यक्रम में शामिल किया गया, अस्पतालों में ज्योतिष बिठाए गए, बच्चे अस्पतालों में ऑक्सिजन की कमीं से मरते रहे।

बावजूद इसके देश का मीडिया बदमस्त बहारों में ‘बागों में बहार है ‘ गाता रहा। कश्मीर से लेकर चीन तक सीमाएं सुलगती रही, अमेरिका को पाकिस्तानी आर्थिक सहायता बढाने के बावजूद भारतीय सीमा रेखा के अंदर से फ्यूल भरने की इजाजत दे दी गई।

भारत में आतंकी हमले की जांच पाकिस्तानी एजेंसी को करने दी गई। बावजूद इसके 56 इंची सीना 56 इंची ही कहलाया क्योंकि इस 56 इंची सीने के पास फूट डालो राज करो की बूटी थी।

 (लेखक- अरविंद वर्मा)