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बंगलौर के एक कॉलेज में पढ़ाये जा रहे हैं दहेज़ के फायदे

दहेज़ ने पीढ़ी दर पीढ़ी न जाने कितनी महिलाओं की जान ली है। न जाने कितने परिवारों को आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया है। मैट्रिमोनियल साइट्स पर या अखबारों में साफ़ साफ़ तो नहीं लिखा होता मगर विज्ञापन निकलते है कि लड़के या लडकी की योग्यता इस प्रकार हैं । उनकी मासिक आय इतनी है और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत सम्माननीय है । ये सब बातें पढ़कर कन्यापक्ष का कोई व्यक्ति यदि वरपक्ष के यहाँ जाता है तो असली चेहरा सामने आता है । वरपक्ष के लोग घुमा-फिराकर ऐसी कहानी शुरू करते हैं जिसका आशय निश्चित रूप से दहेज होता है ।

क्या आप दहेज़ प्रथा के पक्ष में कोई दलील दे सकते हैं ? या किसी तरह आप दहेज़ प्रथा के फायदे गिनवा सकते हैं ? दहेज़ लेने और देने वाले भी खुलकर इसके पक्ष में बोलने से कतराते हैं। IPC के तहत दहेज़ एक दंडनीय अपराध है।

लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक पोस्ट में दहेज़ प्रथा के फायदे के बारे में दवा किया गया है। इसमें तथ्यों के साथ यह दिखाया गया है कि सेंट जोसेफ़ कॉलेज के स्नातक में सोशलॉजी विषय में ‘दहेज़ के फायदे’ नामक शीर्षक में यह पढ़ाया जा रहा है। जिसमे दहेज़ के फायदे बताये जा रहे हैं।

 

 

(एक छात्र ने बताया कि वो किताब का कवर उपलब्ध नहीं करा सकते क्योंकि कॉलेज ने इस अध्याय को फोटोकॉपी नोट के रूप में वितरित किया है)

इसमें दहेज के सात फायदे बताये गए हैं। हालांकि इसमें एकमात्र चेतावनी यह दी गयी है कि इसे दहेज प्रणाली का समर्थन करने वालों के नजरिए के तौर पर लिखा गया है।

इस खंड के अनुसार, दहेज प्रणाली “बदसूरत लड़कियों” के लिए दूल्हे को आकर्षित करने में मदद करती है।

इसमें यह भी कहा गया है कि दहेज शादी करने के लिए अनिच्छुक दूल्हों को तैयार करने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन होता है।

दहेज़ प्रथा की दलील के तौर पर एक कारण यह दिया गया है कि अगर लड़कियों को दहेज़ की जगह ज़मीन में हिस्सा दिया जायेगा तो ज़मीनों के हिस्से छोटे होते जायेंगे।  इससे बचने के लिए दहेज़ एक अच्छी  व्यवस्था है।

 

एक फेसबुक में रितिका रमेश नाम की स्नातक छात्र ने अपनी पोस्ट में लिखा है :
“भारत में प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा का यह स्टैंडर्ड है। 60 की संख्या वाले सोशलॉजी वर्ग में कोई भी छात्र या संकाय सदस्य इस बकवास के खिलाफ खड़ा नहीं हो रहा। यह अध्ययन सामग्री सेंट जोसेफ कॉलेज, शांति नगर, बेंगलुरु द्वारा बी.ए. के स्टूडेंट्स को प्रदान की गई है। हमें अभी एक लम्बा रास्ता तय करना है।”

 

 

कई लोगों ने तर्क दिया कि पुस्तक केवल दहेज प्रणाली को बढ़ावा देने और प्रचार करने वाले लोगों की “मानसिकता” के लिए जगह दे रही है, जिसे दूसरों द्वारा मुकाबलाविरोध भी किया गया।

 

 

रितिका रमेश के दोस्त, जो कॉलेज में अध्ययन करते हैं उन्होंने पृष्ठ की सामग्री के बारे में एक प्रोफेसर से भी पूछा, लेकिन उन्होंने कथित रूप से यह कहकर खारिज किया कि हमें यही पढ़ाने को कहा गया था।
कॉलेज के जनसंपर्क अधिकारी  प्रोफेसर किरण जीवन ने कहा है कि इस मामले की जांच होगी।

यह पोस्ट वायरल हो गयी है और खबर लिखे जाने तक 8270 करीब  शेयर हो चुके हैं ।

लोगों ने इस पर तरह तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त की।

 

 

इसी तरह के एक पैराग्राफ को महाराष्ट्र में कक्षा 12 के छात्रों के लिए सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में मिला है।

 

सोशल मीडिया पर आक्रोश के बाद यह हिस्सा कथित तौर पर हटा दिया गया था।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक पूरे भारत में प्रतिदिन दहेज से 21 लोग मारे जाते हैं, जबकि दंड देने की दर 35 प्रतिशत से कम है।

सोर्स -NCRB

 

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