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सुविधाओं की कमी से जूझते हज़ारों मासूमों की ज़िंदगी बचाता एक डॉक्टर

स्कन्द शुक्ल-

अच्छी बातें अख़बारी कतरनों पर किनारे चाहे न जगह पाएँ , ज़ेहन में उनकी मौजूदगी हाशिये पर ही रहती आयी है। हम ऐसे वक़्त में रह रहे हैं , जहाँ ऊटपटाँग-बेतुकी बयानबाज़ियों पर दिनों-दिन चर्चा की जाती है , किन्तु किसी के प्राणरक्षक कृतित्व पर नहीं। ऐसी ही एक घटना है जिससे अधिकाधिक लोगों को ढंग से परिचित होना चाहिए।

हर साल दुनिया-भर में लाखों बच्चे न्यूमोनिया से मर रहे हैं। इनमें भी अधिक संख्या दक्षिण एशियाई बच्चों की है। न्यूमोनिया होता है , बच्चों के फेफड़ों में उसके कारण द्रव भर जाता है और वे ऑक्सीजन का लेनदेन ढंग से करने लायक नहीं रहते। साँस में भीतर ली गयी हवा से ऑक्सीजन खींचने वाली उनकी नन्हीं बुलबुलेनुमा संरचनाएँ — जिन्हें एल्वियोलाई कहते हैं — बन्द होने लगती हैं। नतीजन हायपॉक्सिया ( ऑक्सीजन की कमी ) से बच्चों के प्राण चले जाते हैं।

दक्षिण एशियाई देशों भारत , पाकिस्तान , बांग्लादेश , श्रीलंका , नेपाल , भूटान में ग़रीबी इतनी है कि ढेरों बच्चे वेंटिलेटर की सुविधा से वंचित हैं। वेन्टीलेटरी तकनीकी कंटिन्युअस पॉज़िटिव एयरवे प्रेशर ( सीपीएपी ) के प्रयोग से अच्छे अस्पतालों के डॉक्टर न्यूमोनिया-पीड़ित बच्चों के बीमार द्रव भरे सूजे फेफड़ों के एल्वियोलाई को सिकुड़ने और बन्द होने से रोकते हैं , ताकि ऑक्सीजन का अनवरत प्रवाह उनके माध्यम से शरीर में होता रहे। लेकिन जिनके पास सीपीएपी की सुविधा न हो , उनके और मौत के बीच में कौन खड़ा हो सकता है ?

बांग्लादेश के डॉ. मोहम्मद ज़ोबायर चिश्ती इन मृतप्राय बच्चों और यमराज के बीच खड़े हैं। शैम्पू की मामूली बोतल से उन्होंने ऐसी जुगाड़ू तकनीकी विकसित की है , जिससे हज़ारों बच्चे आज न्यूमोनिया के घात से बच रहे हैं। बीमार न्यूमोनिया-पीड़ित बच्चे को ऑक्सीजन-युक्त वायु दी जाती है। फिर जब फेफड़े वायु छोड़ते हैं , तो वे सिकुड़ने लगते हैं। यहीं पर डॉ. चिश्ती की विधि काम करती है। बच्चे द्वारा साँस में बाहर निकाली हवा को वे शैम्पू की खाली बोतल में प्रवेश करते हैं , जिसमें थोड़ा पानी होता है। बच्चों द्वारा छोड़ी गयी हवा के बुलबुले इस पानी में उठते हैं और इन्हीं के द्वारा एक पॉज़िटिव प्रेशर (दबाव) पीछे फेफड़ों में लगता है , जो उन्हें सिकुड़ने-बन्द होने से रोकता है।

सौ रूपये की मामूली बोतल से एक डॉक्टर न्यूमोनिया का कामयाब इलाज कर रहा है। इस विधि के प्रयोग से बच्चों में न्यूमोनिया-मृत्यु-दर 75 % तक घट गयी है।


और इस तरह एक डॉक्टर बुलबुलों की मदद से बुलबुलों को बन्द होने से बचाता है

आपको मिथकों में विश्वास हो / न हो , लेकिन डॉ.चिश्ती जैसे लोग ही हमारी मिथकीय कल्पनाओं के लिए उच्चतम यथार्थ हैं। ऐसे ही फ़रिश्तों की ज़िन्दगी पर आगे अफ़साने बुने जाते हैं।

मैं बाहर एक छोटे बच्चे को शैम्पू के झाग से बुलबुले उठाते देख रहा हूँ। सूरज का प्रकाश उसपर पड़ता है और एक इन्द्रधनुषी मुस्कान बुलबुले की सतह पर चमकने लगती है। फिर मैं सूरज की ओर देखता हूँ : मुझे वह डॉ. मोहम्मद ज़ोबायर चिश्ती नज़र आता है।