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विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण – 10 (प्रकृति के नियम और धर्म)

इगतपुरी का विपश्यना केंद्र प्राकृतिक रूप से बहुत मनोरम स्थल पर बना हुआ है। पहाड़ी के नीचे बने हुए कमरे। कहीं कोई आवाज नहीं। रात को कभी-कभी ट्रेन की सीटी सुनाई देती। उसके अलावा चिड़ियों की चहचहाहट। खामोशी ऐसी कि वहां रहने वाला कोई कभी कुछ नहीं बोलता था। पूर्णतया शांति का वातावरण। शांति के […]

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बुद्ध का अनात्मा का सिद्धांत भारत को सभ्य और समर्थ बना सकता है

भारत के धार्मिक दर्शनों में अब तक बौद्ध धर्म के अनत्ता के सिद्धांत को ठीक से नही समझा गया है। इसके भारी दुष्परिणाम हुए हैं। एक चैतन्य सनातन आत्मा और उसके सर्जक परमात्मा (ईश्‍वर) की कल्पना ने भारत को बहुत गहरी गर्त में धकेला है। विज्ञान, सभ्यता और सामान्य बुद्धि तक का ठीक विकास इससे […]

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भारत में “फेमिनिज़्म” की परिपूर्णता एक मिथक है

नारीवाद की अवधारणा भारत में केवल सवर्ण महिलाओं का फैशन है क्योंकि यहाँ फेमिनिज़्म पितृसत्ता का बुलेटप्रूफ़ जैकेट और ब्राह्मणवाद का हथियार है। दरअसल स्त्री अधिकारों और समानता की मुनादी करने वाले सवर्ण नारीवादी लोग ब्राह्मणवादी सिस्टम की कठपुतलियाँ हैं, जिन्हें जातीय प्रिविलेज की रक्षा करने के लिए नारीवाद के नाम का झुनझुना पकड़वाया गया […]

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विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 9 (मुक्ति का मार्ग)

बुद्ध का धम्म मौजूदा धर्म से अलग रहा है। कम से कम मोटी बात समझ में आई। बुद्ध के मुताबिक धर्म वह है जो मानव के बीच भेद न करे। चाहे जाति, क्षेत्र, सम्प्रदाय, मान्यताएं कोई भी, कुछ भी हों।   बुद्ध के अनुसार धर्म बुद्ध के मुताबिक अपने तर्कों व अनुभूतियों से खुद को जानना और प्रकृति के […]

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भारत में क्‍या है अछूत लड़की होने के मायने?

जब तक होश नहीं संभाला था, पता ही नहीं था कि मैं एक अछूत परिवार में जन्मी हूँ। औऱ भारतीय समाज में अछूत लड़की होने के क्या मायने हैं। पहली बार जातिभेद तब झेला जब मैं मात्र 3-4 साल की थी एक ग़रीब परिवार की बच्ची के लिए खीर-पूड़ी बहुत बड़ी बात थी। खीर-पूड़ी खाने […]

मुद्दे सोशल

‘छठ’ पर्व में हैं बौद्धिस्ट परम्परा के अंश- भाषा वैज्ञानिक राजेंद्र प्रसाद सिंह

छठ पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड पूर्वी यूपी और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह पर्व हिंदु धर्म के लोगों में मुख्य पर्व के तौर पर मनाया जाता है। इसमें छठ मईया और सूर्य की पूजा की जाती है। मध्यमार्ग से […]

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हर किसी के जेहन में एक ही सवाल ‘गुजरात चुनाव’ की तारीख कब तय होगी?

साल के पहली छमाही में भारत वालों के सामने सबसे अहम् सवाल था कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा जिसका दो कौड़ी-सा जवाब उन्हें फिल्म के बाद मिल भी गया। दरअसल भारत वालों को जवाब से ज्यादा सवाल में दिलचस्पी होती है। जवाब तो उनके खुद के पास ढेरों हैं। साल के अंत में […]

मुद्दे सोशल

‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और सरकार का वास्तविक एजेंडा

मोदी सरकार ने दो साल पहले बड़ी जोर-शोर से ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना शुरू की थी। इस योजना के प्रचार-प्रसार में ही अब तक 100 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए हैं। यह सरकार की फ्लेगशिप प्लानिंग में से एक है। हर साल भारी-भरकम बजट आवंटन के द्वारा सरकार बेटियों को बचाकर, उन्हें पढ़ाकर लिंगानुपात […]

मुद्दे सोशल

ज्योतिराव फुले : शेतकर्याची आसुड (किसान पर चाबुक) भाग -2

पहले अध्याय में फुले बताते हैं कि एक ओर तो अशिक्षित किसान ब्राह्मणवादी धार्मिक जकड़न के शिकार है, साथ ही औपनिवेशिक शासन का सारा तंत्र भी भट-ब्राह्मण कर्मचारियों पर ही टिका है। अपनी तीक्ष्ण व्यंग्यात्मक शैली में फुले विस्तार से वर्णन करते हैं कि कैसे पूरे जीवन ही नहीं बल्कि उसके पहले मां द्वारा गर्भधारण […]

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बंगलौर के एक कॉलेज में पढ़ाये जा रहे हैं दहेज़ के फायदे

दहेज़ ने पीढ़ी दर पीढ़ी न जाने कितनी महिलाओं की जान ली है। न जाने कितने परिवारों को आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया है। मैट्रिमोनियल साइट्स पर या अखबारों में साफ़ साफ़ तो नहीं लिखा होता मगर विज्ञापन निकलते है कि लड़के या लडकी की योग्यता इस प्रकार हैं । उनकी मासिक आय इतनी है […]