ख़बरें मुद्दे

साहित्यिक व पत्रकार प्रगतिशील वर्ग अब कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए

भारत के प्रगतिशील साहित्यकार और पत्रकारों के साथ क्या हो रहा है यह अब चिंता और चिंतन का विषय बन गया है। प्रगतिशील साहित्यकारों, ब्लागरों और चिंतकों सहित सार्वजनिक जीवन में सक्रीय प्रगतिशीलों पर हमले बढ़ गये हैं। हालत ये है कि अब सोशल मीडिया पर सक्रिय प्रगतिशीलों के साथ भी गुंडागर्दी होने लगी है। ये […]

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आखिर क्यों नेहरू के पीछे पड़ा है आरएसएस ?

  ये देश का मन्तव्य नहीं कि भाजपा संघ की राजनीति करे। यदि संघ को अपनी क्षमताओं पर भरोसा होता तो खुद ही चुनाव न लड़ लेता। इसीलिए भाजपा मुखोटा है संघ का, जनता को विकास, भ्रष्टाचार कह कर गाय, मन्दिर मस्जिद, पकड़ा दिए। ये 70 साल का रोना क्या है ? संघी चाहते थे कि […]

मुद्दे सोशल

बुद्ध का अनात्मा का सिद्धांत भारत को सभ्य और समर्थ बना सकता है

भारत के धार्मिक दर्शनों में अब तक बौद्ध धर्म के अनत्ता के सिद्धांत को ठीक से नही समझा गया है। इसके भारी दुष्परिणाम हुए हैं। एक चैतन्य सनातन आत्मा और उसके सर्जक परमात्मा (ईश्‍वर) की कल्पना ने भारत को बहुत गहरी गर्त में धकेला है। विज्ञान, सभ्यता और सामान्य बुद्धि तक का ठीक विकास इससे […]

मुद्दे सोशल

भारत में “फेमिनिज़्म” की परिपूर्णता एक मिथक है

नारीवाद की अवधारणा भारत में केवल सवर्ण महिलाओं का फैशन है क्योंकि यहाँ फेमिनिज़्म पितृसत्ता का बुलेटप्रूफ़ जैकेट और ब्राह्मणवाद का हथियार है। दरअसल स्त्री अधिकारों और समानता की मुनादी करने वाले सवर्ण नारीवादी लोग ब्राह्मणवादी सिस्टम की कठपुतलियाँ हैं, जिन्हें जातीय प्रिविलेज की रक्षा करने के लिए नारीवाद के नाम का झुनझुना पकड़वाया गया […]

मुद्दे सोशल

विपश्यना : एक अनूठा संस्मरण भाग – 9 (मुक्ति का मार्ग)

बुद्ध का धम्म मौजूदा धर्म से अलग रहा है। कम से कम मोटी बात समझ में आई। बुद्ध के मुताबिक धर्म वह है जो मानव के बीच भेद न करे। चाहे जाति, क्षेत्र, सम्प्रदाय, मान्यताएं कोई भी, कुछ भी हों।   बुद्ध के अनुसार धर्म बुद्ध के मुताबिक अपने तर्कों व अनुभूतियों से खुद को जानना और प्रकृति के […]

मुद्दे सोशल

भारत में क्‍या है अछूत लड़की होने के मायने?

जब तक होश नहीं संभाला था, पता ही नहीं था कि मैं एक अछूत परिवार में जन्मी हूँ। औऱ भारतीय समाज में अछूत लड़की होने के क्या मायने हैं। पहली बार जातिभेद तब झेला जब मैं मात्र 3-4 साल की थी एक ग़रीब परिवार की बच्ची के लिए खीर-पूड़ी बहुत बड़ी बात थी। खीर-पूड़ी खाने […]

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भारत के धूर्त बाबा विज्ञान का भी शोषण कर रहे हैं

धर्म के पंजे और दांत जब कमजोर होने लगते है तब धर्म विज्ञान का मुखौटा ओढ़कर शिकार करता है। ठीक स्वर्ण कंगन का लालच देने वाले उस बूढ़े शेर की तरह जिसकी कहानी हम बचपन में सुनते आये हैं। धर्म का ये बूढ़ा शेर तब जाकिर नाईक, भगवान रजनीश, देवदत्त पटनायक, सदगुरू और श्री श्री […]

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आम आदमी को मार्क्स से पहले अम्‍बेडकर, फुले, पेरियार की ज़रूरत है

बर्टेंड रसल ने मार्क्स पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि मार्क्स के दर्शन में चेतना या स्पिरिट नहीं बल्कि पदार्थ ही चालक है। लेकिन यह पदार्थ भी एक पदार्थ विज्ञानी अर्थ में नहीं बल्कि मनुष्य से पदार्थ के संबन्ध के अर्थ में निर्णायक है। अब चूँकि मनुष्य से पदार्थ का संबन्ध भी मार्क्स के […]

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पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ़्तारी, जो दिख रहा है वह हज़म होने लायक नहीं है

“हमारा सामना राजनीतिज्ञों से नहीं है. हम किसी वैचारिक विरोध के समक्ष नहीं खड़े हैं। हमारा सामना संगठित अपराधियों के एक गिरोह से है” यह लिखने वाले बीबीसी और अमर उजाला जैसे संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा को कथित उगाही के आरोप में छत्तीसगढ़ पुलिस ने शुक्रवार को तड़के उनके आवास […]

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गिरती GDP, जड़ होती अर्थव्यवस्था और आर्थिक मंदी की आहट

भारतीय अर्थव्यवस्था पर मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का प्रभाव आर्थिक मंदी के रूप में दिखाई दे रहा है| नोटबंदी और जीएसटी की जुगलबंदी ने देश को ऐसे गर्त में धकेल दिया है जिसकी भरपाई दीर्घकाल में भी संभव नहीं है| आर्थिक मंदी के चलते पिछली तिमाहियों में ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि […]