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साहित्यिक व पत्रकार प्रगतिशील वर्ग अब कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए

भारत के प्रगतिशील साहित्यकार और पत्रकारों के साथ क्या हो रहा है यह अब चिंता और चिंतन का विषय बन गया है। प्रगतिशील साहित्यकारों, ब्लागरों और चिंतकों सहित सार्वजनिक जीवन में सक्रीय प्रगतिशीलों पर हमले बढ़ गये हैं। हालत ये है कि अब सोशल मीडिया पर सक्रिय प्रगतिशीलों के साथ भी गुंडागर्दी होने लगी है। ये […]

मुद्दे सोशल

बुद्ध का अनात्मा का सिद्धांत भारत को सभ्य और समर्थ बना सकता है

भारत के धार्मिक दर्शनों में अब तक बौद्ध धर्म के अनत्ता के सिद्धांत को ठीक से नही समझा गया है। इसके भारी दुष्परिणाम हुए हैं। एक चैतन्य सनातन आत्मा और उसके सर्जक परमात्मा (ईश्‍वर) की कल्पना ने भारत को बहुत गहरी गर्त में धकेला है। विज्ञान, सभ्यता और सामान्य बुद्धि तक का ठीक विकास इससे […]

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भारत के धूर्त बाबा विज्ञान का भी शोषण कर रहे हैं

धर्म के पंजे और दांत जब कमजोर होने लगते है तब धर्म विज्ञान का मुखौटा ओढ़कर शिकार करता है। ठीक स्वर्ण कंगन का लालच देने वाले उस बूढ़े शेर की तरह जिसकी कहानी हम बचपन में सुनते आये हैं। धर्म का ये बूढ़ा शेर तब जाकिर नाईक, भगवान रजनीश, देवदत्त पटनायक, सदगुरू और श्री श्री […]

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आम आदमी को मार्क्स से पहले अम्‍बेडकर, फुले, पेरियार की ज़रूरत है

बर्टेंड रसल ने मार्क्स पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि मार्क्स के दर्शन में चेतना या स्पिरिट नहीं बल्कि पदार्थ ही चालक है। लेकिन यह पदार्थ भी एक पदार्थ विज्ञानी अर्थ में नहीं बल्कि मनुष्य से पदार्थ के संबन्ध के अर्थ में निर्णायक है। अब चूँकि मनुष्य से पदार्थ का संबन्ध भी मार्क्स के […]

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भारत का धर्म और इसका पलायनवादी आध्यात्म

भारत में सामाजिक राजनीतिक बदलाव को रोकने के लिये सबसे कारगर हथियार की तरह जिस उपकरण को सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है वो है भारत का धर्म और अध्यात्म।   गुलामी का सबसे बड़ा कारण भारत का धर्म और इसका पलायनवादी अध्यात्म भारत की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है। लेकिन दुर्भाग्य ये कि इसे […]

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भारत की गुलामी और पिछड़ेपन का असली कारण

इस देश में एक तबका है जो अपने छोटे से दायरे में एक ही जाति और वर्ण के लोगों की टीम में बैठकर सदियों से निर्णय लेता रहा है। अन्य वर्ण और जातियों की क्या सोच हो सकती है उन्हें पता नहीं। न ही वे पता करने की जरूरत समझते हैं। इसीलिए जिस हुजूम को […]

मुद्दे सोशल

एससी, ओबीसी, मुसलमान सहित सभी भारतीय अल्पसंख्यक और आदिवासी स्वाभाविक मित्र हैं

दलितों और मुसलमानों की एकता की बात से बहुत से प्रश्न उभर रहे हैं। कई तरह के तर्क आ रहे हैं। कुछ मित्रों को लगता है ये अलगाववाद है, ये देश को बांटने का काम है। ये विचित्र बात है कि दो समुदाय अगर भाईचारा बढ़ाते हैं तो इसमें बुराई क्या है? ये अलगाव नहीं […]

मुद्दे सोशल

बुद्ध के साथ अहिंसा का अति आग्रह भी मूर्खता है

बुद्ध के साथ अहिंसा का अति आग्रह भी मूर्खता है। ये भी बौद्धिक आतंक मचाने वाले शोषकों का षड्यंत्र है इससे बाहर निकलिए। जिंदगी में प्रकृति में कहाँ पूर्ण हिन्सा या पूर्ण अहिंसा है? देखकर बताइये जरा? तब बौद्धों को पूर्ण अहिंसक या पूर्ण हिंसक क्यों होना चाहिए?   महायान बुद्ध के मध्यम मार्ग नहीं […]

मुद्दे सोशल

भारत में मार्क्स से पहले अंबेडकर, फुले और पेरियार की जरूरत है

बर्टेंड रसल ने मार्क्स पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि मार्क्स के दर्शन में चेतना या स्पिरिट नहीं बल्कि पदार्थ ही चालक है। लेकिन यह पदार्थ भी एक पदार्थ विज्ञानी अर्थ में नहीं बल्कि मनुष्य से पदार्थ के संबन्ध के अर्थ में निर्णायक है। अब चूँकि मनुष्य से पदार्थ का संबन्ध भी मार्क्स के […]

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राष्ट्रवादियों और पाखण्डी लोगों का सभ्य होना कठिन है

आजादी और देशभक्ति की प्रचलित धारणाएं बहुत ही हवाई किस्म की होती हैं। कम से कम इस मुल्क में तो वे ऐसी ही रही हैं। यह संयोग नहीं है बल्कि बहुत बारीक तरीके से बुना गया षड्यंत्र है। हवाई किस्म की धारणा से मेरा आशय है ऐसी धारणा जिसमे “ओपेरेशनलाइज़” करने को कुछ न हो […]