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लड़कियों के प्रति BHU इतना बर्बर है, क्योंकि वहां ‘आम’ के पेड़ ज्यादा हैं

लड़कियों के प्रति BHU इतना बर्बर इसलिए है, क्योंकि वहां ‘आम’ के पेड़ ज्यादा है। यह एक साबित सत्य है, पहले मैं भी ये सब नहीं मानता था, लेकिन अब मानता हूँ।

अकेला लड़का बहुत देर से एक लड़की को ताड़ रहा था

यह ज्ञान मुझे JNU में हुआ। हम कई दोस्त गंगा ढाबा पर बैठे थे, गप्प कर रहे थे। हमारे बगल के पत्थरों पर एक लड़का बैठा था, अकेले। अचानक कुछ लड़के उसके पास आते हैं -‘आप JNU के हैं?’
‘नहीं, BHU के!’ अकेला लड़का जवाब देता है।
‘लेकिन ये BHU नहीं है…’
‘हाँ, यहाँ बबूल के पेड़ ज्यादा हैं…’अकेला लड़का अकड़के जवाब देता है।
पता चला, अकेला लड़का बहुत देर से एक लड़की को ताड़ रहा था। परेशान होकर लड़की के दोस्त इस अकेले लड़के के पास आये थे। इसमें भी खास बात ये है कि जो लड़का उस अकेले लड़के को डांट रहा था, वो भी BHU का छात्र रह चुका था। जब वो BHU में था, ABVP से जुड़ा था, लड़कियों को फब्तियाँ कसता था। लेकिन JNU में उसके पास एक गर्लफ्रेंड थी, वो AISA का मेम्बर था और आज IAS है।

ये तो हुआ BHU से JNU आये छात्र के बारे में…

अब आपको JNU से BHU जाने का अनुभव बताता हूँ। एक सज्जन हैं रामाज्ञा राय ‘शशिधर’, JNU के पढ़े। साहित्य से जुड़े लोग इन्हें बखूबी जानते हैं। जनता के लेखक माने जाते हैं, इप्टा के लिए गीत लिख चुके है, कई किताबें आ चुकी हैं, कई पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े रहे हैं। जिनको पढ़ने से ज्यादा मैं इनके बारे में सुन रखा था और JNU या दिल्ली में उनसे 3-4 बार मिल भी चुका था।
एक बार मैं अपनी पत्नी से मिलने बनारस गया हुआ था। पता चला, जिस बिल्डिंग में वो रहती है, उसके ग्राउंड फ्लोर पर रामाज्ञा राय रहते हैं। मैं मिलने चला गया। 5-7 मिनट इधर-उधर की बातें हुईं कि बीच में उन्हीने मुझे रोकते हुए पूछा -‘आपने अपना शुभ नाम क्या बताया?’
‘अजय..’ शायद मेरा जवाब उनको संतुष्ट नहीं कर पाया।

‘पूरा नाम?’
‘यादव…’ मैंने उनको संतुष्ट कर दिया।

‘नहीं-नहीं, मेरा ये मतलब नहीं है…’ वो लगे बताने कि BHU जेएनयू नहीं है…ब्ला-ब्ला-ब्ला…

दरअसल यह विश्वविद्यालय सवर्णों का आंगन है। यहां पर लड़कियों को अंधी, बहरी और गूंगी होने की परंपरा निभानी पड़ती है। यहां दलित खुलकर ठहाके नहीं लगाते, मन में मुस्कुराते हैं। जो भी इस ‘आम’ विश्वविद्यालय को जानता है, उसे पता कि छात्राओं का यह आंदोलन किसी विद्रोह से कम नहीं।

लड़कियों, तुम्हारे साहस को सलाम!

(लेखक- अजय यादव )

 

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